Kavya Ki Aatma Aur Aatmiyakaran
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यह पुस्तक गहन अध्ययन, चिंतन, मनन के उपरांत ठोस प्रमाणों और वैज्ञानिक समझ का समावेश करते हुए लिखी गई है। रागात्मक चेतना को काव्य की आत्मा सिद्ध करते हुए संस्कृत काल से चली आ रही रस, ध्वनि, अलंकार , औचित्य, रीति, सात्विक बुद्धि की काव्य के संदर्भ में इनके आत्मा होने के अस्तित्व मान्यताओं को खारिज कर, यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इन सबको आलोकित करने वाला एक ही प्राण तत्त्व है - रागात्मक चेतना। यही सच्चे अर्थों में काव्य की आत्मा है। इसी रागात्मक चेतना से रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य, रीति आदि की सत्ता प्रकाशमय होती है। इसी रागात्मक चेतना को आधार बनाकर अति प्राचीन और वर्तमान समय तक सर्वमान्य सिद्धांत साधारणीकरण को असत्य सिद्ध किया है। इस नाते पुस्तक - काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण एक शोधपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों से युक्त अद्भुत, मौलिक, और सुधी शोध कर्त्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृति है।
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यह पुस्तक गहन अध्ययन, चिंतन, मनन के उपरांत ठोस प्रमाणों और वैज्ञानिक समझ का समावेश करते हुए लिखी गई है। रागात्मक चेतना को काव्य की आत्मा सिद्ध करते हुए संस्कृत काल से चली आ रही रस, ध्वनि, अलंकार , औचित्य, रीति, सात्विक बुद्धि की काव्य के संदर्भ में इनके आत्मा होने के अस्तित्व मान्यताओं को खारिज कर, यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इन सबको आलोकित करने वाला एक ही प्राण तत्त्व है - रागात्मक चेतना। यही सच्चे अर्थों में काव्य की आत्मा है। इसी रागात्मक चेतना से रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य, रीति आदि की सत्ता प्रकाशमय होती है। इसी रागात्मक चेतना को आधार बनाकर अति प्राचीन और वर्तमान समय तक सर्वमान्य सिद्धांत साधारणीकरण को असत्य सिद्ध किया है। इस नाते पुस्तक - काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण एक शोधपूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणों से युक्त अद्भुत, मौलिक, और सुधी शोध कर्त्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृति है।
Book Details
-
ISBNRF-RR-KKAAA
-
Pages10
-
Avg Reading Time1 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लेखकद्वय ने प्राथमिक शिक्षा को अपने चिन्तन का केन्द्रीय बिन्दु बनाते हुए शिक्षा के पूरे परिदृश्य को समझने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है। इन आलेखों के सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनकी रचना शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक स्तर पर काम करते हुए हुई; विभिन्न शिक्षाविदों, शिक्षकों तथा दूसरे सहयोगियों के साथ काम करते हुए जो अनुभव और सबक़ हासिल हुए, लेखकद्वय ने उन्हीं को इन आलेखों में पिरोने की कोशिश की है।
Nai Kahani Aur Amarkant
- Author Name:
Nirmal Singhal
- Book Type:

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प्रेमचंद की कहानी-परंपरा के वाहक के रूप में ख्यात अमरकांत नई कहानी के भी प्रमुख रचनाकार हैं। उनकी कहानियों के निम्न मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय पात्र ‘क़फ़न’ के घीसू-माधव के वंशज प्रतीत होते हैं। साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत के मोहभंग और निराशा को भी उन्होंने अपनी कहानियों में समेटा है। बल्कि कहना चाहिए कि धीरे-धीरे यही तत्व उनकी कहानियों में केंद्रीय होते चले गए हैं। साथ ही आया व्यंग्य और एक तीखा कटाक्ष जो स्वतंत्रता-बाद के सफेद-पोश भारतीय समाज की निर्ममतापूर्वक पोल खोलता है। इसी व्यंग्य के सहारे उन्होंने हमारे भीतर स्थायी भाव की तरह जड़ जमाते संत्रास, ऊब, घुटन, अकेलेपन और भीतरी-बाहरी हिंसा को भी बड़ी कुशलता के साथ रेखांकित किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में अमरकांत के लगभग संपूर्ण कथा-जगत पर एक गहन दृष्टि के साथ-साथ नई कहानी-आंदोलन में उनकी अवस्थिति को तलाशने की भी कोशिश की गई है। इस प्रयास में एक तरफ जहाँ अमरकांत की रचनात्मकता के विभिन्न पहलुओं और उनकी कहानियों में आए पात्रों और अनेक शिल्प व कथ्यगत तत्वों का खुलासा हुआ है, वहीं नई कहानी आंदोलन के विशिष्ट पक्षों और अन्य समकालीन रचनाकारों के योगदान पर भी व्यापक प्रकाश पड़ा है।
Pashchatya Sahitya Chintan
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

- Description: पश्चिम में साहित्य-चिन्तन की सुदीर्घ परम्परा को हिन्दी के पाठकों के लिए प्रामाणिक और सहज ग्राह्य रूप में सुलभ कराने की दिशा में प्रस्तुत ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। प्लेटो से बीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य काव्य-चिन्तन में योगदान देनेवाले सभी महत्त्वपूर्ण विचारकों और प्रवृत्तियों का प्रामाणिक विवेचन इस रचना की विशेषता है; अकादमिक अनुशासन से एक साथ युक्त और मुक्त विश्लेषण-पद्धति इसका प्रमुख आकर्षण है। ग्रन्थ की सामग्री का आधार मूल स्रोत है। बक़ौल प्लेटो : ‘सत्य के अनुकरण का अनुकरण ग्रन्थ की विश्वसनीयता तथा लेखिका की प्रतिबद्धता’ का कारण भी यही है। प्रस्तुत कृति से इस विषय के सुधी पाठकों की बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति होती है।
Premchand : Vigat Mahtta Aur Vartman Arthvatta
- Author Name:
Murli Manohar Prasad Singh
- Book Type:

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भारत के मौजूदा यथार्थ के सर्वग्रासी संकट के समय प्रेमचन्द का कृतित्व आलोचना से पुनर्पाठ की माँग करता रहा है। इसीलिए कथाकार, चिन्तक और सम्पादक-पत्रकार प्रेमचन्द पर एक ऐसी समालोचनात्मक पुस्तक की ज़रूरत महसूस की जाती रही है जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण देशी-विदेशी आलोचकों, राजनीतिक विचारकों तथा समाज वैज्ञानिकों के आलेखों का संचयन सम्भव हो। यह पुस्तक उसी अभाव की पूर्ति है और प्रेमचन्द की 125वीं वर्षगाँठ के समारोहों की शृंखला की एक कड़ी है।
इसमें पाँच उर्दू, दो चीनी, एक जर्मन, तीन अंग्रेज़ी, एक रूसी और लगभग 35 हिन्दी में प्रकाशित आलोचनात्मक आलेख सम्मिलित किए गए हैं—जनार्दन झा ‘द्विज’ से लेकर अरुण कमल तक। इसके अलावा ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद तथा बी.टी. रणदिवे जैसे राजनीतिक-सांस्कृतिक चिन्तकों, ए.आर. देसाई और पूरनचन्द जोशी जैसे समाज वैज्ञानिकों तथा सव्यसाची भट्टाचार्य जैसे इतिहासकार के आलेख भी शामिल किए गए हैं।
प्रेमचन्द के बाद वाली पीढ़ियों के सृजनकर्मियों की आलोचना-दृष्टियों से भी आलोचनाकर्म समृद्ध हुआ है। प्रेमचन्द को अज्ञेय, अमृतलाल नागर, निर्मल वर्मा, कुँवर नारायण आदि किस तरह देखते हैं, उनकी कृतियों में अन्तर्भूत राग-संवेदना और यथार्थ की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को सृजन-प्रक्रिया के स्तर पर किस तरह परखते हैं—इन बातों को ध्यान में रखकर ही उल्लिखित सभी कृतिकारों के आलेख इसमें सम्मिलित कर लिए गए हैं।
सम्पादकों ने अपनी भूमिका में संचयन के आलेखों के प्रति सारसंग्रहवादी रुख़ अपनाने के बजाय आलोचनाकर्म के उन मूलभूत प्रश्नों को उठाया है जो अभी भी उलझन, मतभेद और वाग्युद्ध के लिए पर्याप्त छूट देते हैं। परम्परा के मूल्यांकन के क्रम में उठनेवाले गम्भीर सवालों की रोशनी में भूमिका के अन्तर्गत विचारोत्तेजक विश्लेषण का लचीला साँचा प्रस्तुत किया गया है। दस्तावेज़ी महत्त्व के साथ-साथ यह पुस्तक प्रेमचन्द के पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।
Anuvad Mimansa
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

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Description:
साधारणत: और इधर ज़्यादातर लोग किसी पाठ को एक भाषा से दूसरी भाषा में उल्था करने को ही अनुवाद मान लेते हैं। हिन्दी में यह प्रवृत्ति और भी ज़्यादा देखने में आती है। बहुत कम ऐसे अनुवादक हैं जो अनुवाद को अगर रचना-कर्म नहीं तो कम से कम एक कौशल का भी दर्जा देते हों।
वरिष्ठ हिन्दी आलोचक निर्मला जैन की यह पुस्तक अनुवाद के रचनात्मक, कलात्मक और प्रविधिगत पहलुओं को विश्लेषित करते हुए उसकी महत्ता और गम्भीरता को बताती है। अनुवाद दरअसल क्या है, गद्य और पद्य के अनुवाद में क्या फ़र्क़ है; मानविकी और साहित्यिक विषयों का अनुवाद अन्य विषयों के सूचनापरक अनुवाद से किस तरह अलग होता है, उसमें अनुवादक को क्या सावधानी बरतनी होती है; एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में पाठ के भावान्तरण में क्या दिक़्क़तें आती हैं, लोकभाषा और बोलियों के किसी मानक भाषा में अनुवाद की चुनौतियाँ क्या हैं, और अनुवाद किस तरह सिर्फ़ पाठ के भाषान्तरण का नहीं, बल्कि भाषा की समृद्धि का भी साधन हो जाता है—इन सब बिन्दुओं पर विचार करते हुए यह पुस्तक अनुवाद के इच्छुक अध्येताओं के लिए एक विस्तृत समझ प्रदान करती है।
निर्मला जी की समर्थ भाषा और व्यापक अध्ययन से यह विवेचन और भी बोधक और ग्राह्य हो जाता है। उदाहरणों और उद्धरणों के माध्यम से उन्होंने अपने मन्तव्य को स्पष्ट किया है, जिससे यह पुस्तक अनुवाद का कौशल विकसित करने में सहायक निर्देशिका के साथ-साथ अनुवाद-कर्म को लेकर एक विमर्श के स्तर पर पहुँच जाती है।
Bhakti Kavya-Parampara Aur Kabir
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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सम्पूर्ण भक्ति कविता को एक ही आँख से देखने और एक ही तराजू में तौलनेवालों की भारी भीड़ है। इस भीड़ के सदस्य भक्ति कविता के प्रगतिशील तत्त्वों और यथास्थितिवादी तत्त्वों को अलगाने का विरोध करते हैं। ऐसे लोग यह देखने में असमर्थ हैं कि भक्ति कविता के क्रान्तिकारी तत्त्वों का विरोध करनेवाली सामाजिक शक्तियों की संख्या बहुत बड़ी है।
मुक्तिबोध संगी नामवर सिंह इस पूरी राजनीति के गुब्बारे में सुई चुभोते हैं और भक्ति कविता की दूसरी परम्परा के पक्ष में प्रभावी ढंग से खड़े होते हैं।
बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने भक्ति, भक्ति आन्दोलन और कबीर पर पुनः-पुनः विचार किया। वे बताते हैं कि भक्ति आन्दोलन के साथ ही आधुनिक भाषाओं ने पहली बार साहित्यिक जीवन प्राप्त किया। भक्ति ने कविता की भाषा को क्रान्तिकारी ढंग से बदला। भक्ति-कविता ने काव्यभाषा का जनतांत्रीकरण ही नहीं किया, उसे रचनात्मक नवाचारों से गूँथ दिया।
कबीर की क्रान्तिकारी विरासत को अक्सर आधुनिक यथास्थितिवादियों व सुधारवादियों ने एक खास तरह से संकुचित किया। हिन्दू-मुसलमान एकता का लक्ष्य रखनेवाले विचारकों और नेताओं ने एक खास तरह से उन्हें समन्वयवाद में सीमित करने की कोशिश की। नामवर जी कबीर के रास्ते को अन्य मार्गों से अलग निरूपित करते हुए कबीर की क्रान्तिकारिता को इस प्रकरण में भी पुनः स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
आधुनिक साम्प्रदायिकता के विकास ने भक्ति कविता की प्रासंगिकता में एक नया आयाम जोड़ा है और उसके मानवीय आदर्शों के मूल्य को कई गुना बढ़ा दिया है। इस संदर्भ में भी नामवर जी के भक्ति-कविता संबंधी विचारों को वापस देखने की जरूरत है।
इस पुस्तक में उनके भक्ति कविता और कबीर सम्बन्धी आलेखों, व्याख्यानों और साक्षात्कार-अंशों को संकलित किया गया है।
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