Hindi Bhasha Ka Udgam Aur Vikas
(0)
Author:
Uday Narayan TiwariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
800
640 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास’ में हिन्दी का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण उपस्थित किया गया है। विवेचन के लिए परिनिष्ठित हिन्दी के रूप को लिया गया है। हिन्दी की विभिन्न बोलियों के सम्बन्ध में अब तक अल्प सामग्री ही प्रकाश में आई है। पुस्तक को दो भागों में विभक्त किया गया है। पूर्व पीठिका में भारोपीय से लेकर अपभ्रंश तथा संक्रातिकालीन भाषा की सामग्री दी गई है और उत्तरपीठिका में केवल हिन्दी भाषा का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण दिया गया है।</p> <p>पुस्तक की पूर्व पीठिका में भारोपीय वैदिक संस्कृति, पालि-प्रकृत आदि के सम्बन्ध में जो सामग्री दी गई है, उसे जाने बिना भाषा-विज्ञान का अध्ययन करना व्यर्थ का परिश्रम करना है। यह सामग्री केवल हिन्दी के भाषा विज्ञान के अध्ययन करनेवालों के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के भी प्रारम्भिक अध्ययन के लिए आवश्यक है। </p> <p>आशा है, हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत एवं पालि-प्रकृत के विद्यार्थी भी इससे लाभ उठाएँगे।
Read moreAbout the Book
हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास’ में हिन्दी का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण उपस्थित किया गया है। विवेचन के लिए परिनिष्ठित हिन्दी के रूप को लिया गया है। हिन्दी की विभिन्न बोलियों के सम्बन्ध में अब तक अल्प सामग्री ही प्रकाश में आई है। पुस्तक को दो भागों में विभक्त किया गया है। पूर्व पीठिका में भारोपीय से लेकर अपभ्रंश तथा संक्रातिकालीन भाषा की सामग्री दी गई है और उत्तरपीठिका में केवल हिन्दी भाषा का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण दिया गया है।</p>
<p>पुस्तक की पूर्व पीठिका में भारोपीय वैदिक संस्कृति, पालि-प्रकृत आदि के सम्बन्ध में जो सामग्री दी गई है, उसे जाने बिना भाषा-विज्ञान का अध्ययन करना व्यर्थ का परिश्रम करना है। यह सामग्री केवल हिन्दी के भाषा विज्ञान के अध्ययन करनेवालों के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के भी प्रारम्भिक अध्ययन के लिए आवश्यक है। </p>
<p>आशा है, हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत एवं पालि-प्रकृत के विद्यार्थी भी इससे लाभ उठाएँगे।
Book Details
-
ISBN9788180311024
-
Pages456
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bharat Ki Bhashayen Evam Bhashik Ekta Tatha Hindi
- Author Name:
Mahavir Saran Jain
- Book Type:

- Description: भारत में भाषाओं , प्रजातियों , धर्मों , सांस्कृतिक परम्पराओं एवं भौगोलिक स्थितियों का असाधारण एवं अद्वितीय वैविध्य विद्यमान हैं । विश्व के इस सातवें विशालतम देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया से अलग करते हैं जिससे इसकी अपनी अलग पहचान है , अविरल एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है ; राष्ट्र की अखण्डित मानसिकता अनेकता में है । एकता तथा एकता में अनेकता की विशिष्टता के कारण भारत को विश्व में अद्वितीय सांस्कृतिक लोक माना जाता है । भाषिक दृष्टि से भारत बहुभाषी देश है । प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय भाषाविज्ञान की बहुत - सी भ्रान्तियों को दूर करने की विनम्र पहल की गयी है तथा मौलिक, प्रामाणिक एवं अकाट्य मान्यताएँ एवं स्थापनाएँ प्रस्थापित हैं ।
Sangeet, Kavita, Hindi Aur Mughal Badshah
- Author Name:
Ajay Tiwari
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Bihari Ratnakar
- Author Name:
Jagannath Das Ratnakar
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक बिहारी-रत्नाकर में विशेषत: इस बात का ध्यान रखा गया है कि पाठकों की समझ में शब्दार्थ तथा भावार्थ भली-भाँति आ जाएँ। दोहे के शब्दों के पारस्परिक व्याकरणिक सम्बन्ध तथा कारक इत्यादि को स्पष्ट रूप से प्रकट करने का भी यथासम्भव प्रयत्न किया गया है। प्रत्येक दोहे के पश्चात् उसके कठिन शब्दों के अर्थ हैं और फिर उस दोहे के कहे जाने का अवसर, वक्ता, बोधव्य इत्यादि, ‘अवतरण' शीर्षक के अन्तर्गत बतलाए गए हैं। उसके पश्चात् ‘अर्थ' शीर्षक के अन्तर्गत दोहे का अर्थ लिखा गया है। अर्थ लिखने में जो कोई शब्द अथवा वाक्यांश कठिन ज्ञात हुआ, उसका अर्थ, उसके पश्चात् गोल कोष्ठक में दे दिया गया है और जिस किसी शब्द अथवा वाक्यखंड का अध्याहार करना उचित समझा गया, वह चौखूँटे कोष्ठक में रख दिया गया है। जहाँ कहीं कोई विशेष बात कहने की आवश्यकता प्रतीत हुई, वहाँ टिप्पणी एक भिन्न वाक्य-विच्छेद (पैराग्राफ़) में
लिखी गई है। इस टीका में अधिकांश दोहों के अर्थ अन्यान्य टीकाओं से भिन्न हैं। उनके यथार्थ होने की विवेचना पाठकों की समझ, रुचि तथा न्याय पर निर्भर है।
Vichar Ka Aina Kala Sahitya Sanskriti : Mahadevi Verma
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

-
Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
छायावाद के आधार स्तम्भों में से एक महादेवी कवि और विमर्शकार दोनों ही रूपों में अद्वितीय हैं। अपनी कविताओं में उन्होंने स्त्री जीवन की मार्मिक विडम्बनाओं को स्वर दिया है तो अपनी चर्चित कृति ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में उन्होंने उन अवरोधों की सटीक पहचान की जिन्होंने सदियों से स्त्री को पराधीनता के घेरे में रोक रखा है। स्त्री की अस्मिता की खोज करते हुए अपने पूरे परिवेश के प्रति सहज राग उनके समूचे चिन्तन को उल्लेखनीय विशिष्टता प्रदान करता है। करुणा उनके चिन्तन की धुरी है। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब उन पाठकों के लिए बहुत उपयोगी होगी जो भारतीय स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को समझते हुए उसकी मुक्ति के देशज स्रोतों की तलाश में हैं।
Aadi, Ant Aur Aarambh
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
‘भारत सिर्फ़ एक ‘नेशन स्टेट’ नहीं है। शताब्दियों से हमारे देश की सीमाएँ वे स्वागत-द्वार रही हैं जिनके भीतर आते ही उत्पीड़ित और त्रस्त जातियाँ अपने को सुरक्षित पाती रही हैं।’
यह लिखते हुए निर्मल वर्मा यह भी कहते हैं कि एक प्राचीन वट-वृक्ष की तरह भारतीय संस्कृति ने अपनी छाया तले अनेक समुदायों को ऐसा पवित्र स्पेस दिया जहाँ वे मुक्त हवा में साँस ले सकें।
क्या आजादी के बाद हमने एक राष्ट्र के रूप में अपनी इस विराटता को छीज जाने दिया?
ऐसे ही प्रश्नों पर मनन करते हुए इस पुस्तक के निबन्ध उस आत्म-उन्मूलन को भी रेखांकित करते हैं जिसके चलते आधुनिक मनुष्य अपने ही स्पेस में शरणार्थी जैसा हो चला है। अलग-अलग अवसरों पर लिखे गए इस पुस्तक के अधिकांश निबन्ध, भले ही उनके विषय कुछ भी हों, आत्म-उन्मूलन के इस ‘अन्धकार’ को कहीं-न-कहीं चिह्नित करते हैं।
भारतीय बुद्धिजीवी की भूमिका, धर्म और साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और भारतीयता आदि विषयों के अलावा यहाँ संकलित निबन्ध हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कुछ प्रश्नों को भी अपने दायरे में लेते हैं।
चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत सेना के आक्रमण और भारत के आपातकाल से जुड़े दो आलेख भी इस पुस्तक में शामिल हैं।
Manak Hindi Ke Shuddh Prayog : Vol. 4
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
- Book Type:

-
Description:
सशक्त अभिव्यक्ति के लिए समर्थ हिन्दी चाहिए।
इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।
पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Kargil: A Saga of Sacrifice & Heroism
- Author Name:
Rishi Raj
- Book Type:

- Description: This book is a great tribute to our brave soldiers who fought fiercely in the Kargil War. In this book, you will know about the lives of various Kargil heroes such as Captain Saurabh Kalia, Captain Vijyant Thapar, Captain Vikram Batra, Captain Manoj Pandey, and many other young soldiers who had sacrificed their lives for the pride of Mother India. You will learn how our nerves had refused to admit defeat, even under adverse conditions and now they turned the tables on Pakistan no had assumed the war to be already won. in this book, the author Is also sharing his experience of meeting the families of the martyrs. The Kargil war was an outcome of Pakistan's betrayal as they had used Stealth to occupy 150 posts located along the 160 Km long Line of Control. This book also sheds light on our political and diplomatic victory and various other aspects of the Kargil War like the refusal of both China and the United States to provide any support to the Pakistani forces. This book Is an attempt by the author to keep alive the memories of all those martyrs, who laid their lives in the service of nation.
Shabd Aur Smriti
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
‘शब्द और स्मृति’ के निबन्ध निर्मल वर्मा को विशेष प्रिय थे। वे इन्हें ‘पर्सनल ब्रूडिंग’ के निबन्ध कहते थे जिनमें उन्होंने अपने आप तक लौटने की प्रक्रिया को आँकने की कोशिश की है।
आधुनिकता जिसने विक्टोरियन युग की रूढ़ियों को इतनी सफलतापूर्वक तोड़ा, धीरे-धीरे ख़ुद एक रूढ़ि बनती दीखने लगी। उसकी कोख से अपने अलग तरह के अन्धविश्वासों की उत्पत्ति हुई। इन निबन्धों में निर्मल जी उन्हीं अन्धविश्वासों, रूढ़िगत फ़ैशनों और फ़ार्मूलों पर शंका प्रकट करते हैं।
इन निबन्धों में वे भारतीय आत्म की उस दुहरी प्रकृति को भी उघाड़ने की कोशिश करते हैं, जो परम्परा और आधुनिकता के द्वैत का परिणाम है। यह प्रक्रिया एक तरह से उनकी अपनी आत्मा की पड़ताल भी हो जाती है। आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में हम इस पुनरावलोकन की ज़रूरत को और ज़्यादा महसूस करते हैं।
लम्बे यूरोप-प्रवास के दौरान अर्जित उनकी एक भिन्न दृष्टि भी यहाँ दिखाई देती है जो भारतीय चेतना के अंगीभूत अवयवों को कुछ दूर से देखती है, और उनके साथ जुड़े अपने संस्कारों को भी। पश्चिम की तार्किकता और भारत की तर्कातीत समग्रता का मुखामुखम इन निबन्धों को और रोचक बनाता है।
Vaikalpik Bharat Ki Talash
- Author Name:
Ravibhushan
- Book Type:

-
Description:
आज़ादी के बाद हमने एक नया भारत बनाने की योजनाएँ बनाई थीं। एक शोषणविहीन, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, समतामूलक भारत जहाँ न कोई किसी की दया का मोहताज हो, न किसी को किसी से भय हो, न धर्म के नाम पर लोग मरें, न जाति के नाम पर कोई समाज की मुख्यधारा से बाहर रहे। लेकिन ऐसा हो न सका।
कुल मिलाकर हम उतना आगे नहीं बढ़ सके, जितना अपेक्षित था। हममें से अनेक आज भी उस आज़ादी को तरस रहे जो उनके पुरखों ने गांधी, भगत सिंह की मौजूदगी में सोची थी। लोग बीमार हैं और अस्पतालों में उनके लिए जगह नहीं है, वो जिन्हें अपने उद्धारक प्रतिनिधियों के रूप में चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजते हैं, वो अगले दिन उन्हें पहचानने से इनकार कर देते हैं, जिस व्यवस्था के दायरे में वे अपने घर-परिवार के सपने बुनते हैं, वह एक दिन सिर्फ़ अपने लिए काम करती नज़र आती है।
वैकल्पिक भारत कोई दिमाग़ी शग़ल नहीं है। ज़रूरत है। जिन्हें अपने अलावा किसी भी और की चिन्ता है, वे सब इस ज़रूरत को महसूस करते हैं। रविभूषण सजग आलोचक और सरोकारों के साथ जीनेवाले विचारक हैं। इस पुस्तक में उनके उन आलेखों को शामिल किया गया है जो उन्होंने पिछले दिनों एक चिन्तनशील नागरिक और बौद्धिक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए लिखे हैं।
पुस्तक का विषय-क्रम देश के समय को एक-एक चरण में पार करते हुए आज तक आता है। दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द से शुरू करते हुए वे आज़ादी, बाद की सत्ता और समाज के चरित्र पर आते हैं और अन्त राष्ट्रवाद पर करते हैं। वही राष्ट्रवाद जो आज उन तमाम ताक़तों का मुखौटा बना हुआ है जिन्हें अपने अलावा किसी भी और का बोलना पसन्द नहीं। जो हिंसा को अपने अस्तित्व का पर्याय मानते हैं, और जिन्हें जाने क्यों लगने लगा है कि यह देश सिर्फ़ उनका है।
Samkalin Hindi Upanyas : Samay Se Sakshatkar
- Author Name:
Dr. Alangvam Vijayalaxmi
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी उपन्यास और साठोत्तरी भारतीय जीवन–सन्दर्भ विशिष्ट संवाद–सूत्रों के सहारे आपस में जुड़े हुए हैं। इस जुड़ाव का विस्तार जिन कृतियों में ख़ास तौर पर विद्यमान हैं, उनमें ‘राग दरबारी’, ‘महाभोज’ और ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ की पहचान सबसे अलग है। साठोत्तरी भारत का कड़वा और नंगा सच इन रचनाओं की विषयवस्तु का जनक है। अपने देश और समाज के साथ–साथ अपने समय की परख करने के लिए इन उपन्यासों तथा इनके जैसी आँच रखनेवाले कुछेक अन्य उपन्यासों का अध्ययन विश्लेषण अनिवार्य है।
डॉ. ई. विजयलक्ष्मी ने अपनी इस समीक्षा–पुस्तक में मुख्यत: दस साठोत्तरी उपन्यासों को अध्ययन का आधार बनाया है और उनके सहारे अपने समय से साक्षात्कार का प्रयास किया है। उनके द्वारा चुने गए सभी उपन्यास महत्त्वपूर्ण लेखकों के हैं तथा लम्बे समय से चर्चा में रहे हैं। लेखिका ने उनके विश्लेषण व मूल्यांकन में उपलब्ध सामग्री का सदुपयोग किया है और अपने निजी अध्ययन से प्राप्त नवीन निष्कर्ष पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश की है। डॉ. विजयलक्ष्मी का यह समीक्षा–ग्रन्थ अध्ययन की स्वस्थ एवं तटस्थ परम्परा की पहचान कराने वाला है।
Harishankar Parsai : Desh Ke Is Daur Mein
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

-
Description:
देश के इस दौर में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-निबन्धों की विवेचना है। यह वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि के साथ विवेचना की है। परसाई पर केन्द्रित पुस्तकों में इस पुस्तक का अपना अलग स्थान है। बकौल ज्ञानरंजन ‘यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।’
त्रिपाठी जी का मानना है कि ‘परसाई का रचनाकार एक इतिहास-पुरुष है जो अपने समय का सबकुछ देख रहा है, अपने युग का चित्र बना रहा है। विवेक के साथ।’ वे कहते हैं कि ‘परसाई का व्यंग्य असहज-असुन्दर का उद्घाटन करके सहज-सुन्दर को गढ़ने का प्रयास करता है।’
लगभग चालीस वर्षों में फैली परसाई की रचनात्मकता को इस पुस्तक में विश्वनाथ त्रिपाठी ने जितने आत्मीय ढंग से जान-समझकर हम तक पहुँचाया है, उससे परसाई हमें एक नए सिरे से समझ आते हैं। वर्तमान की उनकी समझ, अपने पात्रों को लेकर उनकी संवेदना की व्यापकता, मनोविकारों का चित्रण, उनके व्यंग्य-निबन्धों के विषयों का असीम संसार, मानवीय करुणा, चरित्र-चित्रण और उनके सौन्दर्यबोध को उद्धरणों के साथ जिस तरह यहाँ विश्लेषित किया गया है, वह अपूर्व है।
यह इस पुस्तक का परिवर्द्धित संस्करण है जिसमें परसाई के जीवन-वृत्त के साथ भूमिका के रूप में उनके व्यंग्य पर केन्द्रित एक लम्बा आलेख भी शामिल किया गया है।
Manak Hindi Ke Shuddh Prayog : Vol. 1
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
- Book Type:

-
Description:
सशक्त अभिव्यक्ति के लिए समर्थ हिन्दी चाहिए।
इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।
पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Kabristan Mein Panchayat
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
‘कब्रिस्तान में पंचायत’ कवि केदारनाथ सिंह की एक गद्य कृति है—एक कवि के गद्य का एक विलक्षण नमूना—जिसमें उसकी सोच, अनुभव और उसके पूरे परिवेश की कुछ मार्मिक छवियाँ मिलेंगी और बेशक वे चिन्ताएँ भी जो सिर्फ़ एक लेखक की नहीं हैं। पुस्तक के नाम में जो व्यंग्यार्थ है, वह हमारे समय के गहरे उद्वेलन की ओर संकेत करता है और शायद इस बात की ओर भी कि इस अबोलेपन की हद तक बँटे हुए समय में परस्पर बातचीत के सिवा कोई रास्ता नहीं। यह अबोलापन इतना गहरा है और इतनी दूर तक फैला हुआ कि आज एक माँ और ‘उसके द्वारा रची गई उसकी अपनी ही सृष्टि’ के बीच एक लम्बी फाँक आ गई है। इस पुस्तक के ज़्यादातर आलेख इन्हीं फाँकों या दरारों के बोध से पैदा हुए हैं—फिर वह अक्का महादेवी की पीड़ा-भरी चुनौती हो या एक रहस्यमय दर्द से एक मामूली आदमी का मर जाना।
इन आलेखों में एक सुखद विविधता मिलेगी, जिसका फलक एक ओर वाक्यपदीयम् से कोलकाता की सड़क पर पड़ी घायल चिड़िया तक फैला है और दूसरी ओर विस्मृत दलित कवि देवेन्द्र कुमार से दलित कविता के पितामह तेलगू के महाकवि गुर्रम जाशुआ तक। दक्षिण के कुछ कालजयी रचनाकारों पर लिखी गई तलस्पर्शी टिप्पणियाँ इस पुस्तक को एक और विस्तार देती हैं और थोड़ी-सी अखिल भारतीयता भी।
पारदर्शी और कसी हुई भाषा में लिखे गए ये आलेख कुछ समय पूर्व दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में क्रमिक रूप से छपे थे और वृहत्तर पाठक-समुदाय द्वारा पढ़े-सराहे गए थे। कुछ नई सामग्री के साथ उन आलेखों को एक जगह एक साथ पढ़ना एक अलग ढंग का अनुभव होगा और शायद एक आवयिक संग्रथन का सूचक भी।
Samkalin Hindi Kahani : Antrang Parichay
- Author Name:
C. M. Yohannan
- Book Type:

-
Description:
कहानी सदा लोकप्रिय रही है। इससे सम्बन्धित आन्दोलनों में भी पर्याप्त उछल-कूद रही है। ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘सहज कहानी’, ‘सक्रिय कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समान्तर कहानी’ फिर परवर्ती ‘सहज कहानी’ आदि आन्दोलनों ने कहानी को आलोचना के केन्द्र में बनाए रखा है, परन्तु कहानी तो कहानी होती है। इतना आवश्यक है कि विधा के आकर्षण को बनाए रखने के लिए इसके कलात्मक पक्ष में बदलाव आता रहता है। प्रस्तुति में अन्तर का बदलाव कहानी को रोचक बनाता है। प्रस्तुति का द्वन्द्व ही वस्तुत: किसी भी रचना को महान बनाता है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में रचित कहानियाँ विषयवस्तु एवं कला की दृष्टि से तो ध्यान आकर्षित करती हैं परन्तु साथ ही बाज़ारवाद, भ्रष्टाचार, स्वार्थवाद, ढिंढोरावाद आदि प्रवृत्तियों के कारण जीवन-शैली के बदलाव को भी रेखांकित करती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की कहानियों पर विस्तृत तथा सारगर्भित आलोचनात्मक टिप्पणी है। यह हिन्दी कहानी की दीर्घकालीन यात्रा का आलोचनात्मक सोपान है जो बिना खेमेबाज़ी के, सहज-सार्थक भाव से इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के कहानीकारों एवं रचनाओं पर बेबाक, निष्पक्ष टिप्पणी करता है तथा कहानी-यात्रा के विकास को दक्षतापूर्वक सहेजता है।
Samsaamyik Hindi Natkon Mein Khandit Vyaktitwa Ankan
- Author Name:
Dr. T.R. Pateel
- Book Type:

-
Description:
मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में खंडित व्यक्तित्व एक आधुनिक संकल्पना है। आज का मानव टूटा हुआ, थका हुआ, हारा हुआ व्यक्ति है और इसी कारण उसका व्यक्तित्व भी खंडित है। इस विषय पर फुटकर रूप में कुछ विवेचन कतिपय पुस्तकों में अवश्य हुआ है किंतु अपनी समग्रता में खंडित व्यक्तित्व की परिधि में इसके अध्ययन की आवश्यकता बनी हुई थी। डॉ. टी. आर. पाटील की यह पुस्तक ‘समसामयिक हिंदी नाटकों में खंडित व्यक्तित्व अंकन’ इस अभाव की पूर्ति का एक सफल प्रयास है ।
डॉ. पाटील ने अपनी इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में जहाँ खंडित व्यक्तित्व के अर्थबोध और अर्थ-विस्तार के साथ उसकी अवधारणा पर अपने गम्भीर विचार प्रस्तुत किए हैं, वहीं 1947 से 1985 तक प्रकाशित प्रतिनिधि नाटकों को परिलक्षित कर उनमें अंकित खंडित व्यक्तित्व के विविध आयामों को विवेचित-विश्लेषित किया है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रेम और यौन समस्या, आत्मविश्लेषणवाद, मानव का असंगत जीवन, राजनीतिक-आर्थिक चेतना, सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से प्रभावित हिंदी नाटकों में प्रतिबिंबित खंडित व्यक्तित्व को विस्तार के साथ विश्लेषित किया है।
खंडित व्यक्तित्व को रंगमंच पर प्रस्तुत करने की दृष्टि से नाटककारों ने जिस रंगमंच की अभिनव कल्पना की है उसमें मंच-सज्जा, पात्रों के क्रिया-व्यापार, पात्रों का अतर्द्वंद्व, पात्रों की वेश-भूषा, प्रकाश-योजना, ध्वनि-योजना, गीत-संगीत के विशिष्ट प्रयोग, नव्य यांत्रिक साधन तथा विविध रंगकर्मियों और निर्देशकों का योगदान और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को दिखाने का जो सफल प्रयास डॉ. पाटील ने किया है, वह इस पुस्तक की एक अनुपम उपलब्धि है।
Anviti - Khand : 2
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

-
Description:
कुँवर नारायण हमारे समय के बड़े कवि हैं। यदि विश्व के कुछ चुनिन्दा कवियों की तालिका बनाई जाए तो उसमें निस्सन्देह उनका स्थान होगा। वे आधुनिक बोध और संवेदना के उन कवियों में हैं जिन्होंने सदैव कविता को मनुष्यता के आभरण के रूप में लिया है।
कुँवर नारायण का काव्य मानवीय गुणों का ही नहीं, मानवीय संस्कारों का काव्य है। कविता में उनका प्रवेश चक्रव्यूह से हुआ। अपने गठन में कलात्मक किन्तु दार्शनिक प्रतीतियों वाले इस संग्रह में जीवन की पेचीदगियों को कवि ने सलीक़े से उठाया है। ‘आत्मजयी’ की लगभग अधसदी के बाद ‘वाजश्रवा के बहाने’ की रचना बतौर कुँवर नारायण यह भी जताने के लिए है कि यदि ‘आत्मजयी’ में मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो ‘वाजश्रवा के बहाने’ में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है। उनके इस कथन को हम इस रोशनी में देख सकते हैं कि सारा कुछ हमारे देखने के तरीक़े पर निर्भर है—कुछ ऐसे कि यह जीवन विवेक भी एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो।
उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है। अनेक शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण का कृतित्व बहुवस्तुस्पर्शी है। वर्ष 2002 से पहले तक उनके व्यक्तित्व एवं कृतियों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेख ‘उपस्थिति’ नामक संचयन में समाविष्ट हैं। उसके पश्चात् लिखे निबन्धों का यह संकलन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का चयन है। इसमें हाल की कुछ प्रकाशित कृतियों को छोड़कर बाक़ी कृतियों पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है जो उपस्थिति में सम्मिलित नहीं हैं। अधिकांश लेख 2015 तक के हैं जब कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘कुमारजीव’ प्रकाशित हुआ।
आशा है, पाठकों को ये दोनों खंड उपयोगी और प्रासंगिक लगेंगे तथा कुँवर नारायण के साहित्य के प्रति रुचि विकसित करेंगे।
Jayasi : Ek Nai Drishti
- Author Name:
Raghuvansh
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक जायसी साहित्य के अध्ययन-चिन्तन में एक नई दृष्टि की शुरुआत करती है। धर्म, दर्शन और आचरण की मूल्यपरक रचना-प्रक्रिया मानवीय संस्कृति की आन्तरिक प्रकृति है—इस ज्ञान के साथ उन्होंने पाया है कि इसी की अभिव्यक्ति मनुष्य की कलाओं और साहित्य में होती है।
प्रस्तुत पुस्तक के विभिन्न प्रकरणों में जायसी के जीवन, दार्शनिक चिन्तन, उनकी आध्यात्मिक दृष्टि, साधना की भाव-भूमि, मानवीय जीवन के सारे परिवेश के साथ उसके मूल्य प्रक्रिया के विविध पक्षों को विवेचित करने में लेखक ने सर्वथा नई दृष्टि से काम लिया है।
जायसी साहित्य के अध्येताओं के लिए डॉ. रघुवंश की यह पुस्तक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है।
A History of Kashmiri Literature
- Author Name:
Trilokinath Raina
- Rating:
- Book Type:

- Description: Kashmiri literature, with poetry as its chief mode of expression, is said to have started with Lal Ded and Sheikh-ul-Alam. Over the last sixty years, it has expanded into various genres such as essays, criticism, history, drama, and fiction. Kashmiri literature now holds a significant place in Indian Letters. This book chronicles the history of Kashmiri literature from its beginnings to the present.
A History Of Indian Literature 500-1399
- Author Name:
Sisir Kumar Das
- Rating:
- Book Type:

- Description: A prequel to a History of Indian Literature 1800-1910, the present volume deals with the first nine hundred years of the medieval period of Indian Literary history. The literary scene in India during the period presents a fantastically varied and wide spectrum of thought and expressions, here vibrant, there dull, now vigorous and natural now sophisticated and recondite at once sublime and crude
Sikkh Guruon Ka Punysmaran
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस पुस्तक में गुरु नानक देव व अर्जुन देव आदि सिख गुरुओं के साहित्यिक पक्ष पर अपने विचार व्यक्त किए हैं ।
आचार्य द्विवेदी ने इस पुस्तक में गुरुनानक देव के व्यक्तित्व, सन्देश और महिमा के साथ-साथ शिष्य परम्परा और गुरू अर्जुन देव द्वारा ग्रंथ साहिब के संपादन पर प्रकाश डालते हुए गुरु गोविंद सिंह के जीवन-दर्शन, दशम ग्रंथ तथा भारतीय साहित्य में दशम ग्रंथ के स्थान के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार किया है । निश्चय ही यह पुस्तक शोधार्थियों और सिक्सों के धार्मिक साहित्य में रुचि रखनेवाले अध्येताओं के लिए उपयोगी होगी ।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book