Etihasik Bhashavigyan Aur Hindi Bhasha
(0)
Author:
Ramvilas SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
796 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
रामविलास जी ने भाषा की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया को समझने के लिए प्रचलित मान्यताओं को अस्वीकार किया और अपनी एक अलग पद्धति विकसित की।</p> <p>वे मानते थे कि कोई भी भाषापरिवार एकान्त में विकसित नहीं होता, इसलिए उसका अध्ययन अन्य भाषापरिवारों के उद्भव और विकास से अलग नहीं होना चाहिए। वे चाहते थे कि प्राचीन लिखित भाषाओं की सामग्री का उपयोग करते समय जहाँ भी समकालीन उपभाषाओं, बोलियों आदि की सामग्री प्राप्त हो, उस पर भी ध्यान दिया जाए, इसी तरह आधुनिक भाषाओं पर काम करते हुए उनकी बोलियों के भाषा-तत्त्वों को भी सतत ध्यान में रखा जाए। भाषा की विकास-प्रक्रिया के विषय में उनकी मान्यता थी कि भाषा निरन्तर परिवर्तनशील और विकासमान है। विरोध और भिन्नता के बिना भाषा न गतिशील हो सकती है, न वह आगे बढ़ सकती है। इसलिए किसी भी भाषा के किसी भी स्तर पर, विरोधी प्रवृत्तियों और विरोधी तत्त्वों के सहअस्तित्व की सम्भावना के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।</p> <p>इन तथा कुछ और बातों, जो रामविलास जी की भाषावैज्ञानिक समझ का अनिवार्य अंग थीं, को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान नहीं किया गया, अगर ऐसा किया जाता तो निश्चय ही कुछ नए निष्कर्ष हासिल होते। रामविलास जी ने विरोध का जोखिम उठाकर भी यह किया, जिसके प्रमाण इस पुस्तक में भी मिल सकते हैं।
Read moreAbout the Book
रामविलास जी ने भाषा की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया को समझने के लिए प्रचलित मान्यताओं को अस्वीकार किया और अपनी एक अलग पद्धति विकसित की।</p>
<p>वे मानते थे कि कोई भी भाषापरिवार एकान्त में विकसित नहीं होता, इसलिए उसका अध्ययन अन्य भाषापरिवारों के उद्भव और विकास से अलग नहीं होना चाहिए। वे चाहते थे कि प्राचीन लिखित भाषाओं की सामग्री का उपयोग करते समय जहाँ भी समकालीन उपभाषाओं, बोलियों आदि की सामग्री प्राप्त हो, उस पर भी ध्यान दिया जाए, इसी तरह आधुनिक भाषाओं पर काम करते हुए उनकी बोलियों के भाषा-तत्त्वों को भी सतत ध्यान में रखा जाए। भाषा की विकास-प्रक्रिया के विषय में उनकी मान्यता थी कि भाषा निरन्तर परिवर्तनशील और विकासमान है। विरोध और भिन्नता के बिना भाषा न गतिशील हो सकती है, न वह आगे बढ़ सकती है। इसलिए किसी भी भाषा के किसी भी स्तर पर, विरोधी प्रवृत्तियों और विरोधी तत्त्वों के सहअस्तित्व की सम्भावना के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।</p>
<p>इन तथा कुछ और बातों, जो रामविलास जी की भाषावैज्ञानिक समझ का अनिवार्य अंग थीं, को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान नहीं किया गया, अगर ऐसा किया जाता तो निश्चय ही कुछ नए निष्कर्ष हासिल होते। रामविलास जी ने विरोध का जोखिम उठाकर भी यह किया, जिसके प्रमाण इस पुस्तक में भी मिल सकते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126703081
-
Pages311
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Hindi Path
- Author Name:
Sushila Gupta
- Book Type:

-
Description:
छात्रों को हिन्दी भाषा की आधारभूत जानकारी देने के साथ-साथ हिन्दी को बातचीत की भाषा के रूप में भी सहज बनाना इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है, इसलिए शब्द-भंडार के स्तर पर भी सावधानियाँ बरती गई हैं। पुस्तक के अध्यायों को सरल रखने का हर सम्भव प्रयास किया गया है।
पुस्तक के दस अध्यायों का रोमन में लिप्यन्तरण किया गया है। लिप्यन्तरण में (.) को (n) के रूप में दर्शाया गया है। जैसे—‘लोगों’ के लिए जहाँ ‘logo’ लिखा गया है वहाँ (.) के उच्चारण को समझाने के लिए (n) को कोष्ठक में रखा गया है।
किताब का शीर्षक ‘हिन्दी पथ’ अंग्रेज़ी और हिन्दी की समानताओं को सामने लाता है। (वर्तनी और अर्थ के साथ)।
आशा है, हिन्दी की तरफ़ जानेवाला यह पथ विदेशी छात्रों के लिए सरल और रुचिकर होगा।
Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Ram Manohar Lohia
- Author Name:
Rammanohar Lohia
- Book Type:

-
Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
स्वतंत्रता आन्दोलन की कोख से जन्मे राममनोहर लोहिया ऐसे विचारक राजनेता हैं जिन्होंने अपने लिए लोकतंत्र की आत्मा यानी एक सक्षम और निडर विपक्ष की भूमिका चुनी। जवाहरलाल नेहरू जैसे लोकप्रिय जननेता की असफलताओं को खुलकर सामने रखते हुए उन्होंने दिखाया कि विपक्ष को सरकार की तथ्यात्मक आलोचना करते हुए किस कदर निर्मम होना चाहिए। समाजवाद का भारतीयकरण करते हुए उसे उन्होंने संस्कृति और परम्परा से जोड़ा। धर्म और संस्कृति के अनेक मिथकों को डिकोड करते हुए उन्होंने परम्परा के जरूरी हिस्सों को पुनर्नवा बनाने का काम किया। हमें उम्मीद है कि उनके प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब उन सबको रास्ता दिखाएगी जो अपनी सुदीर्घ परम्परा और संस्कृति से प्रेम करते हैं और धर्म के राजनीतिक दुरुपयोग और लोकतंत्र को संकुचित करने वाली शक्तियों के हावी होने के खतरों से समाज को बचाना चाहते हैं।
Kamayani Aur Hindi Alochana
- Author Name:
Sudhir Ranjan Singh
- Book Type:

-
Description:
‘कामायनी’ हिन्दी की प्रौढ़ कृति है। इसमें मानवता का बचपन अभिव्यक्त हुआ है। बचपन हमें मोहित करता है। वह भविष्य की प्रेरणा का काम करता है। ‘कामायनी’ काव्याभिव्यक्ति के रूप में यह क्षमता रखती है। इसमें युग-चिन्ता है; आशा है; ‘काम-राग’ है; कर्म है; संघर्ष है; और साम्य-विचार की गूँज भी है। कलात्मक अभिव्यक्ति की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ काव्य है। इसने चार दशकों तक हिन्दी आलोचना को प्रभावित किया है। आधुनिक कविता पर विचार की दृष्टि से इसने सबसे अधिक स्थान घेर रखा है। हिन्दी की कोई एक कविता नहीं, जिसने इसके बराबर हलचल पैदा की हो। ‘राम की शक्ति-पूजा’ भी नहीं। ‘अँधेरे में’ भी नहीं। ‘असाध्य वीणा’ भी नहीं। और ‘कामायनी’ के बाद हिन्दी कविता ने जो नया किया है, उसमें ‘कामायनी’ का कितना योग है, यह भी अध्ययन का दिलचस्प विषय है।
‘कामायनी’ की व्याख्या की कई दृष्टियाँ हैं, कई रूप हैं। इस पुस्तक में ‘कामायनी’ सम्बन्धी प्रतिनिधि आलोचना का अध्ययन किया गया है। ‘कामायनी’ और उसकी आलोचना में दिलचस्पी रखनेवाले पाठक इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे।
—भूमिका से
Shrilal Shukla Ki Duniya
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

-
Description:
स्वातंत्र्योत्तर भारतीय यथार्थ के अत्यन्त सतर्क और विलक्षण उद्घाटनकर्ता हैं श्रीलाल शुक्ल। उन्होंने रचनात्मकता का जैसा जादू बिखेरा, वैसा उनके अतिरिक्त अन्य किसी से सम्भव न हुआ। उपन्यास, कहानी, निबन्ध, व्यंग्य, आलोचना आदि विविध विधाओं में फैला उनका साहित्य भारतीय समाज का महायथार्थ प्रकट करता है। साथ ही वह भाषा और शिल्प के अभूतपूर्व और अप्रतिम रूपों का आविष्कार भी करता है। ऐसे में श्रीलाल शुक्ल के जीवन और साहित्य के सत्यों, प्रश्नों, रहस्यों और जिज्ञासाओं को सुलझाने और उनका मूल्यांकन प्रस्तुत करनेवाले पुस्तक की आवश्यकता लम्बे अर्से से थी। उस आवश्यकता को पूरा करती है यह पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’।
प्रसिद्ध युवा कथाकार अखिलेश द्वारा सम्पादित यह कृति श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और सृजन के अध्ययन की विभिन्न विचारोत्तेजक छवियाँ प्रस्तुत करती है। अनेक विख्यात रचनाकारों के लेखों से समृद्ध यह पुस्तक हिन्दी में सर्वाधिक पढ़े जा रहे साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को विधिवत् जानने का अचूक ज़रिया है।
‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ कोई अभिनन्दन ग्रन्थ नहीं है। यहाँ तो व्यक्ति और लेखक श्रीलाल शुक्ल को लेकर बहसें हैं, मत वैभिन्य हैं, विश्लेषण हैं, सन्देह और भरोसे हैं। इसीलिए श्रीलाल शुक्ल और उनके लेखक की तरह ही जीवन्त, उत्तेजक, बेलौस और संजीदा बन सका है उनके समग्र मूल्यांकन का यह संसार।
‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ में श्रीलाल शुक्ल पर इतनी अधिक, इतनी बेशक़ीमती सामग्री उपस्थित है और मूल्यांकन की इतनी प्रविधियाँ हैं कि पाठक, विद्वान, लेखक, शोधार्थी सदा लाभान्वित होते रहेंगे।
Shrilal Shukla Sanchayita
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

- Description: स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज को समझने के लिए जिन रचनाकारों ने अपने तर्क निर्मित किए हैं, उनमें श्रीलाल शुक्ल का महत्त्व अद्वितीय है। विलक्षण गद्यकार श्रीलाल शुक्ल वस्तुतः हमारे समय का विदग्ध भाष्य रचते हैं। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह जटिल और संश्लिष्ट जीवन के प्रति पूर्ण सचेत दिखते हैं। उनका लेखन किसी आन्दोलन या विचारधारा से प्रभावित नहीं रहा, वह भारतीय समाज के आलोचनात्मक परीक्षण का रचनात्मक परिणाम है। राग दरबारी उनकी ऐसी अमर कृति है जिसने हिन्दी रचनाशीलता को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सुयश दिलाया। इस संचयिता के छह भाग हैं, जिनमें उनके उपन्यास, कहानी, व्यंग्य, निबन्ध, विनिबन्ध और आलोचनात्मक रचनाएँ समाहित हैं। उन तमाम चीज़ों को इस पुस्तक में शामिल करने का प्रयास किया गया है, जिनकी सार्थकता सार्वकालिक है।
Hindi Aalochana Aur Bhaktikavya
- Author Name:
Rustam Roy
- Book Type:

-
Description:
‘हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य’ में रुस्तम राय ने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया, काव्य में लोकमंगल की अवधारणा और उसका संधान, सौन्दर्यानुभूति की पहचान, भक्तिकाव्य की सामाजिक भूमिका, काव्यानुभूति की विशुद्धता और भक्तिकाव्य की प्रगतिशीलता पर विस्तार-पूर्वक विचार किया है। उन्होंने हिन्दी आलोचना के मूल्य-निर्माण की प्रक्रिया के साथ-साथ हिन्दी आलोचकों के भक्तिकाव्य विषयक मूल्यांकन को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करते हुए अपने मौलिक विचार भी प्रकट किए हैं। एक प्रकार से हिन्दी आलोचना और भक्तिकाव्य, दोनों पर इस किताब में पुनर्विचार का प्रयत्न है और भक्तिकाव्य से हिन्दी आलोचना के अंतरंग सम्बन्ध की नई व्याख्या भी। लेखक ने सगुण-निर्गुण और उसके सामाजिक आधारों पर विचार करते हुए न केवल भक्त कवियों के आन्तरिक द्वन्द्व को बल्कि आलोचकों के मतों के अन्तर्विरोध को भी उजागर किया है।
कबीर और तुलसी के प्रसंग में उठनेवाले विवादों पर भी इस पुस्तक में चर्चा की गई है। इन दोनों कवियों की विश्व-दृष्टियों के अन्तर को रेखांकित करते हुए उनके आध्यात्मिक विचारों के बदले सामाजिक विचारों को प्राथमिकता दी गई है। इस पुस्तक में एक तरह से भक्तिकाव्य की आलोचना के माध्यम से हिन्दी आलोचना का इतिहास भी प्रस्तुत किया गया है।
समग्रतः इस पुस्तक में लेखक ने न केवल परिश्रम, सूझबूझ और आलोचकीय विवेक का परिचय दिया है, बल्कि मूल्यों की टकराहट और मूल्यांकनों के द्वन्द्व में उसने अपना स्वतंत्र विवेक नहीं खोया है। इसीलिए लेखक के निष्कर्षों से उसके निर्णय की क्षमता भी प्रकट होती है। निश्चय ही पुस्तक की प्रस्तुति स्तरीय, भाषा विषयानुकूल, प्रवाहपूर्ण और परिमार्जित है।
—डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
Kahani Ki Rachana Prakriya
- Author Name:
Parmanand Srivastav
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘कहानी की रचना-प्रक्रिया’ में पुरानी कहानी और नई कहानी की रचना-प्रक्रिया के सूक्ष्म भेदों को समझने का प्रयत्न किया गया है और पहली बार रचना की प्रक्रिया से सम्बन्धित समस्याओं को कहानी-साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में उठाया गया है।
कहानी-साहित्य की रचनात्मक प्रक्रिया के अध्ययन-क्रम के आरम्भ में क्रमश: रचना-प्रक्रिया की ‘आधारभूमि’ रचना-प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक आधार, रचना-प्रक्रिया के साहित्यिक आधार, कहानी के प्राचीन रूप, कहानी के नए रूप, रचनात्मक चेतना का कहानी नामक साहित्यिक विधा में उपयोग, शास्त्रीय समीक्षा द्वारा निर्धारित कहानी-कला के प्रमुख तत्त्वों के रचनात्मक उपयोग की सम्भावना तथा रचना-प्रक्रिया और आधुनिकता के प्रमुख स्तर, रचनाकार, रचना-प्रक्रिया और पाठक आदि विषयों पर विचार किया गया है और प्रतिपादित किया गया है कि रचना-प्रक्रिया कोई जड़ यंत्र नहीं है, बल्कि वह रचनाकार की मानसिक संवेदना, सामाजिक परिवेश तथा उसके कलात्मक अनुभवों से सम्बन्धित एक जागरूक प्रक्रिया है जिसमें रचनाकार न केवल रचनात्मक अनुभवों को सम्प्रेषित करता है, बल्कि अपने को पाता भी है, उपलब्ध भी करता है।
दूसरे, तीसरे और चौथे अध्यायों में पूर्व प्रेमचन्द, प्रेमचन्द युग के पूर्वार्द्ध की कहानी, उत्तर प्रेमचन्द-युग की हिन्दी कहानी की विशेषताओं और सीमाओं की व्याख्या की गई है।
पाँचवें अध्याय में हिन्दी कहानी के विविध युगों की रचना-प्रक्रिया की चेतना का अध्ययन प्रस्तुत करते हुए कथा की चेतना या साक्षात्कार के प्रति विभिन्न युगों के कृतिकारों के दृष्टिकोणों में व्याप्त मौलिक अन्तर की व्याख्या की गई है।
छठे और अन्तिम अध्याय में जहाँ आज की कहानी की नई दिशाओं की ओर संकेत किया गया है, वहीं उसके परिशिष्ट में रचना-प्रक्रिया की चेतना पर समूचे अध्ययन के आधार पर पुनर्विचार की आवश्यकता का अनुभव किया गया है।
पुस्तक में साठोत्तर कहानी और आज की कहानी पर कई निबन्ध इस दृष्टि से दिए गए हैं कि आज के पाठक को यह कृति कथा आलोचना के क्षेत्र में सार्थक प्रस्थान दिखे।
Ardhanareeshwar
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक के निबन्ध अपने समय के दस्तावेज हैं जिनको पढ़ते दिनकर के वैचारिक-स्रोतों और सन्दर्भों से हम अवगत हो सकते हैं; और जान सकते हैं कि एक युगद्रष्टा साहित्यकार अपने जीवन में अपनी कलम के साथ किस द्वन्द्व-अन्तर्द्वन्द्व के साथ जीता रहा। ‘अर्धनारीश्वर’ दिनकर का वह निबन्ध-संग्रह हैं जिसमें समाज, साहित्य, राजनीति, स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, धर्म, विज्ञान के साथ-साथ लेखकों, चिन्तकों, मनीषियों, राजनेताओं के कृतित्व और व्यक्तित्व से जुड़े अनेक पहलुओं का व्यापक परिप्रेक्ष्य में गम्भीरता से आकलन किया गया है और तर्क-सम्मत निष्कर्ष निकाले गए हैं। इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ क्यों रखा गया, इसके बारे में स्वयं लेखक का कहना है कि, '“इसमें ऐसे भी निबन्ध हैं जो मन-बहलाव में लिखे जाने के कारण कविता की चौहद्दी के पास पड़ते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिनमें बौद्धिक चिन्तन या विश्लेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस संग्रह का नाम ‘अर्धनारीश्वर’ रखा है, यद्यपि इसमें अनुपातत: नरत्व अधिक और नारीत्व कम है।” अतएव स्पष्ट है कि राष्ट्रकवि दिनकर की कविताएँ जिन्हें पसन्द हैं, उन्हें ये निबन्ध भी उनकी सोच-संवेदना के बेहद करीब लगेंगे।
Pandit Nehru Aur Anya Mahapurush
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पुस्तक पंडित जवाहरलाल नेहरू और तीन अन्य महापुरुषों—स्वामी विवेकानन्द, महर्षि रमण और महात्मा गांधी—के विषय में हमें विशेष जानकारी देती है।
राष्ट्रकवि दिनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के संस्मरण में लिखते हैं—‘‘कि क्या पंडित जवाहरलाल नेहरू तानाशाह थे?’’ दिनकर जी नेहरू जी के जीवन-दर्शन, गांधी और नेहरू के आपसी रिश्ते और भारतीय एकता के लिए पंडित जी के प्रयासों को हमारे सामने लाते हैं।
इस पुस्तक में दिनकर जी के तीन रेडियो-रूपकों को भी संगृहीत किया गया, जो क्रमशः स्वामी विवेकानन्द, महर्षि रमण और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों के जीवन को आधार बनाकर लिखे गए हैं। इन रूपकों में न केवल उनके प्रेरक जीवन की झलकियाँ हैं, बल्कि उनमें इन महापुरुषों का जीवन-दर्शन भी समाहित है। ये रेडियो-रूपक जितने श्रवणीय हैं, उतने ही पठनीय भी।
नए रूप और आकार में यह पुस्तक न केवल सामान्य पाठक, बल्कि दिनकर-साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
Acharya Shukla : Pratinidhi Nibandha
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के अनन्य निबन्धकार हैं। साहित्यिक, शास्त्रीय और शैक्षिक दृष्टि से उनके निबन्धों का अध्ययन अनिवार्य है, पर उनके प्रतिनिधि निबन्धों का एक भी संकलन ऐसा नहीं है जो उनकी विधायिनी प्रतिभा का सम्यक् परिचय दे सके। इस परिप्रेक्ष्य में ‘आचार्य शुक्ल : प्रतिनिधि निबन्ध’ बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शुक्ल जी की प्राय: सभी उपलब्ध और अनुपलब्ध कृतियों का प्रतिनिधित्व करती है यह पुस्तक।
पुस्तक में शुक्ल जी के प्रतिनिधि निबन्धों को तीन भागों में बाँटा गया है—वैचारिक निबन्ध, सैद्धान्तिक निबन्ध और व्यावहारिक निबन्ध। संकलन के आधार हैं—‘बुद्ध चरित’, ‘विश्व प्रपंच’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘रस-मीमांसा’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘हिन्दी निबन्ध माला’, ‘भारतेन्दु साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘चिन्तामणि’ (भाग—दो), ‘सूरदास’ आदि। संकलन का प्रारम्भिक निबन्ध उनके ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से संगृहित है। यह लेख उनकी दृष्टि से निबन्ध का मानदंड प्रस्तुत करता है। इसे संग्रह की प्रस्तावना के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। काव्य-क्रम की दृष्टि से भी प्रारम्भ से लेकर उनके जीवन के अन्तिम समय तक लिखे गए निबन्धों का पुस्तक में समावेश किया गया है। भाषा, साहित्य शास्त्र तथा हिन्दी के भक्ति साहित्य से लेकर ‘कामायनी’ तक इन निबन्धों के विषय हैं। इसलिए उनकी व्यापक मान्यताओं और भेद में अभेद देखनेवाली तत्वग्राही दृष्टि का सम्यक् ये निबन्ध देते हैं। इस दृष्टि से इनकी परिधि बड़ी व्यापक है।
शुक्ल जी का सर्वोत्तम लेखन ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का प्रकाशन है और आजन्म वे उससे सम्बद्ध भी रहे। इसलिए ‘सभा’ के वर्तनी सिद्धान्त का ही व्यवहार किया गया है, यथा—पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग और दो से अधिक सामासिक शब्दों में ही समास चिन्ह का प्रयोग। शुक्ल जी रखा न लिखकर ‘रक्खा’ लिखते थे ताकि देवनागरी के उच्चारण की वैज्ञानिकता—जो लिखा जाए, वही पढ़ा जाए—सुरक्षित रह सके, उसका भी पालन किया गया है।
परिशिष्टों में आचार्य शुक्ल का जीवन-वृत्त और कृतियों के संकेत-सूत्र दे दिए गए हैं और उनके निबन्धों का संक्षिप्त मूल्यांकन हिन्दी निबन्ध-परम्परा के परिवेश में कर दिया गया है। शोधार्थियों, अध्येताओं आदि के लिए संग्रहणीय और महत्त्वपूर्ण कृति।
Upanyas Ka Kavyashastra
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

-
Description:
आज का उपन्यास चुनौती देता है। आलोचक इस चुनौती को स्वीकार करता हुआ पुराने समीक्षात्मक पैटर्न को तोड़कर नया पैटर्न तलाशता है।
इस पुस्तक में आलोचनात्मक सिद्धान्तों की कसौटी पर उपन्यासों और कहानियों की परख नहीं की गई है, बल्कि उपन्यासों-कहानियों की कसौटी पर सिद्धान्तों को देखा-कसा गया है। समय के अन्तराल के साथ-साथ पाठकों-आलोचकों के विचार और आस्वाद में परिवर्तन आ जाता है। वे साहित्य को देशकाल की नई ‘कंडिशनिंग’ में देखने के लिए बाध्य होते हैं। ‘गोदान’, ‘सुनीता’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘शेखर : एक जीवनी’, ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’, ‘कितने पाकिस्तान’ और ‘काशी का अस्सी’ आदि औपन्यासिक प्रतिमानों को तोड़ने-गढ़ने वाले उपन्यासों के अलावा इस किताब में कुछ कहानियों पर भी विचार किया गया है।
सिद्धान्तों की कसौटी कहानियों को भी मान्य नहीं है। इस पुस्तक में पाँच कहानियाँ विवेचित हैं—‘उसने कहा था’, ‘एक रात’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘कफ़न’ और ‘एक राजा निरबंसिया थे’।
मूलतः पुस्तक में सिद्धान्त बरक्स रचना का विवेचन है। विभिन्न उपन्यासों और कहानियों को यहाँ पर एक दृष्टिकोण से विवेचित किया गया है। प्रबुद्ध पाठक इससे टकरा भी सकते हैं और इसे आगे भी बढ़ा सकते हैं।
Premchand Ke Aayam
- Author Name:
A. Arvindakshan
- Book Type:

-
Description:
प्रायः प्रेमचन्द के पाठक उन्हें यथार्थवाद के प्रवर्तक और किसानी जीवन के चितेरा मानते हैं। सही भी है। यह प्रेमचन्द का एक आयाम है। किन्तु प्रेमचन्द द्वारा प्रवर्तित यथार्थवाद सिर्फ़ एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं है। उनका यथार्थवाद भारतीय इतिहास के यथार्थ से उद् भूत एक विराट पहचान है, जिसको सरसरी दृष्टि से देखकर साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित करना इतिहास को अनदेखा करना है। अतः यह आवश्यक है कि उनकी यथार्थ-दृष्टि के मूल में स्थित इतिहास के विस्तृत फलक को देखें और परखें। प्रेमचन्द सम्बन्धी इस अध्ययन का मूल उद्देश्य यही है, जिसमें सिर्फ़ प्रेमचन्द को ही नहीं पहचाना गया है बल्कि उनके समय ने भी मूर्तरूप ले लिया है। इस अर्थ में प्रेमचन्द का आस्वादन समान्तरतः संस्कृति का गम्भीर विश्लेषण भी है।
प्रेमचन्द की विपुल सम्भावनाओं को दृष्टि में रखकर ही इस ग्रन्थ का शीर्षक ‘प्रेमचन्द के आयाम’ रखा गया है। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें भारत के विभिन्न गाँवों, क़स्बों, शहरों और महानगरों के लेखकों के आलेख हैं। इसमें हिन्दी के प्रतिष्ठित समीक्षकों के साथ-साथ उभरते लेखकों के विचार भी शामिल हैं। प्रेमचन्द के बहाने अपने समय का पुनर्मूल्यांकन इन आलेखों का अभीष्ट है।
Drishya Aur Dhwaniyan : Khand—2
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

-
Description:
गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात् संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्य-मूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता, आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए, उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती में से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे।
—सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से)
''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खण्डों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जि़ल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Hindi Aalochana ka Doosra Path
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

-
Description:
अनुसन्धान, सिद्धान्त-निरूपण, पांडित्यपूर्ण-अध्ययन, साहित्येतिहास आदि आलोचना के लिए उपयोगी हो सकते हैं, ख़ुद आलोचना नहीं हो सकते। आलोचना के इस वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल बहुत पहले कर चुके थे।
आलोचना का सही सन्दर्भ और उसकी सार्थकता की सच्ची कसौटी रचना ही हो सकती है और होती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि समकालीन रचनात्मक साहित्य की समीक्षा सार्थक आलोचना की पहली ज़िम्मेदारी है। इस दृष्टि से आलोचना के विकास में गम्भीरता से की गई पुस्तक-समीक्षाओं की भूमिका असन्दिग्ध है। ऐसी ही समीक्षाओं के बीच से अक्सर आलोचना का विकास होता है—बशर्ते समीक्षक की वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी सन्देहातीत हो। इसी क्रम में पूर्ववर्ती रचनाओं और रचनाकारों के पुनर्मूल्यांकन के प्रयास भी सामने आते हैं। सिद्धान्त-निरूपण और पूर्वकालीन कृतियों की ये व्याख्याएँ समकालीन रचनाओं की समीक्षा के सन्दर्भ में ही प्रासंगिकता प्राप्त करती हैं।
हिन्दी आलोचना के किसी इतिहास का मुख्य लक्ष्य इसी प्रासंगिकता की प्रतिष्ठा होना चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर हिन्दी आलोचना का पूरा परिदृश्य ही नए रूप में उद्घाटित होता है।
आज आवश्यकता हिन्दी आलोचना के इतिहास को उसके समुचित परिदृश्य में रखने की ही है। इस कृति में इसी परिदृश्य का साक्षात्कार करने का प्रयास किया गया है।
—‘भूमिका’ से
Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Nirala
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
हिन्दी कविता के सौन्दर्यशास्त्र को हमेशा के लिए बदल देनेवाले सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ऐसे कवि-दार्शनिक हैं जिन्होंने कविता को न सिर्फ एक नए सौन्दर्य-बोध के साथ सड़क पर उतार दिया अपितु छायावाद को प्रगति की कामना और श्रम के मूल्यों से जोड़ने का भी काम किया। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास हों या निबन्ध हों, उनके लेखन और चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता के बीच एक द्वन्द्वात्मक रिश्ता सदा बना रहा जिसने उनके लेखन में विलक्षण रूप से नए-नए अर्थ सम्भव किए। उनकी “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” जैसी पंक्ति अन्यायी सत्ता और उसके प्रतिरोध में खड़े जन का एक कालजयी रूपक बन गई। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब पाठकों के समक्ष निराला के चिन्तन की एक मुकम्मल तसवीर पेश कर सकेगी।
Swatantra Bharat Ki 75 Pramukh Rajneetik Ghatnayen
- Author Name:
Mamta Chandrashekhar
- Book Type:

- Description: आजादी का अमृत महोत्सव' भारत के गौरवमय स्वाधीनता संग्राम की गाथा को वर्तमान की छाती पर उकेरने का एक सुनहरा अवसर है। भारतीय स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण होने की इस पावन वेला में, यह वक्त है, उन जाने-अनजाने अनंत बलिदानियों को श्रद्धाजंलि अर्पित करने का, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का, जिनके खून से सींची गई जमीं पर आज हम भारतीय अपने सुकून की चादर बिछा रहे हैं, अपने गरिमामय जीवन की बुनियाद रख रहे हैं। वर्तमान भारत सरकार ने इसी भावना के प्रति आदरभाव व्यक्त रखते हुए एक आधिकारिक राष्ट्रीय पर्व के आयोजन की शुरुआत 12 मार्च, 2021 को की थी। सर्वविदित है कि 15 अगस्त, 2022 को 'भारतीय स्वाधीनता' के 75 साल पूर्ण हो चुके हैं। ऐसा लगता है, मानो आजादी की 75वीं सालगिरह हम सबसे पूछ रही है कि स्वाधीनता की चुनरिया तो ओढ़ा दी, परंतु वह क्षण कब आएगा, जब भारतमाता के सिर पर कोहनूर से जड़ा ताज सजेगा? वह वक्त कब आएगा, जब भारत विकासशील राज्यों की श्रेणी में समाहित होगा? इन्हीं प्रश्नों पर विचार-मंथन करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी समूचे भारतवासियों को प्रेरित कर रहे हैं। इस पुस्तक में स्वतंत्र भारत की ऐसी ही 75 राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जिसके समावेशी ज्ञान के आत्मपरीक्षण् से गुजरकर भारत एक वैश्विक महाशक्ति बनकर उभरेगा।
Bihari Ratnakar
- Author Name:
Jagannath Das Ratnakar
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक बिहारी-रत्नाकर में विशेषत: इस बात का ध्यान रखा गया है कि पाठकों की समझ में शब्दार्थ तथा भावार्थ भली-भाँति आ जाएँ। दोहे के शब्दों के पारस्परिक व्याकरणिक सम्बन्ध तथा कारक इत्यादि को स्पष्ट रूप से प्रकट करने का भी यथासम्भव प्रयत्न किया गया है। प्रत्येक दोहे के पश्चात् उसके कठिन शब्दों के अर्थ हैं और फिर उस दोहे के कहे जाने का अवसर, वक्ता, बोधव्य इत्यादि, ‘अवतरण' शीर्षक के अन्तर्गत बतलाए गए हैं। उसके पश्चात् ‘अर्थ' शीर्षक के अन्तर्गत दोहे का अर्थ लिखा गया है। अर्थ लिखने में जो कोई शब्द अथवा वाक्यांश कठिन ज्ञात हुआ, उसका अर्थ, उसके पश्चात् गोल कोष्ठक में दे दिया गया है और जिस किसी शब्द अथवा वाक्यखंड का अध्याहार करना उचित समझा गया, वह चौखूँटे कोष्ठक में रख दिया गया है। जहाँ कहीं कोई विशेष बात कहने की आवश्यकता प्रतीत हुई, वहाँ टिप्पणी एक भिन्न वाक्य-विच्छेद (पैराग्राफ़) में
लिखी गई है। इस टीका में अधिकांश दोहों के अर्थ अन्यान्य टीकाओं से भिन्न हैं। उनके यथार्थ होने की विवेचना पाठकों की समझ, रुचि तथा न्याय पर निर्भर है।
Hindi Upanyas Ka Stree-Path
- Author Name:
Rohini Agrawal
- Book Type:

-
Description:
कहा जाता है कि आज की ज़मीन पर खड़े होकर पुरानी कृतियों का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, ख़ासकर स्त्री एवं दलित दृष्टि से क्योंकि उस समय समाज स्त्री एवं दलित प्रश्नों को लेकर न इतना संवेदनशील था, न सजग। यह भी तर्क दिया जाता है कि लेखक अपने युग की वैचारिक हदबन्दियों के बीच रहकर ही अभिव्यक्ति की राह चुनता है। मुझे इस मान्यता पर आपत्ति है। एक, यदि युगीन वैचारिक हदबन्दियाँ ही रचना की घेरेबन्दी करती हैं, तब वह कालजयी कृति कैसे हुई? दूसरे, यदि साहित्यकार रचयिता/स्रष्टा है तो उसे अपनी गहन अन्तर्दृष्टि, उन्नत भावबोध और प्रखर कल्पना द्वारा वह सब साक्षात् करना है जो उसके अन्य समकालीनों की कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से बाहर छूट रहा है। सृजन के समय अन्तर्दृष्टि के पंखों पर सवार लेखक जब कल्पनाशीलता के आकाश में विचरण करता है तो सोलहों आने लेखक होता है। मुक्ति की आकांक्षा से दिपदिपाती उसकी चेतना जड़ता और पराधीनता, बन्धन और व्यवस्थागत दबावों का निषेध कर व्यक्ति को ‘मनुष्य’ रूप में देखने लगती है।
मनुष्य को केन्द्र में रखनेवाला, मनुष्य-संसार की गति, ऊर्जा और सपनों से स्पन्दित होनेवाला साहित्य निर्वैयक्तिक हो ही नहीं सकता। एक ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मनुष्य और समाज की तरह साहित्य और साहित्यकार की भी है। लाख छुपाने की कोशिश करे इंसान, बड़े-बड़े दावों और डींगों के बीच अपनी क्षुद्रताओं और शातिरबाज़ियों को रंचमात्र भी नहीं छुपा पाता। लेखक भी इसका अपवाद नहीं।
पात्रों-स्थितियों-घटनाओं के ज़रिए बेशक वह नए वक़्त की आहटें लेने में सजग भाव से सन्नद्ध रहे, लेकिन इन्हें पाटती दरारों के बीच वह अभिव्यक्त हो ही जाता है। प्रेमचन्द से बहुत पहले पहली स्त्री शिक्षिका सावित्रीबाई फुले पर सड़े अंडे-टमाटर फेंककर स्त्रीद्वेषी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता रहा है पुरुष-समाज।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित रचनाकारों के दायित्वपूर्ण योगदान को धुँधलाने की धृष्टता नहीं, आलोचना के पुंसवादी स्वर के बरअक्स स्त्री-स्वर को धार देने की कोशिश है। यों भी साहित्य शब्दों-पंक्तियों-पन्नों-जिल्द में बँधी हदबन्दियों का मोहताज नहीं कि लाइब्रेरियों में पड़ा सड़ता रहे। जब वह एक नई समाज-संस्कृति, विचार या चरित्र बनकर लौकिक जगत के बीचोबीच आ बैठता है, तब उसे नई चुनौतियों और नए बदलावों के बीच निरन्तर अपने को प्रमाणित भी करते रहना पड़ता है।
Adhunik Vishwa Sahitya Aur Siddhant
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
आधुनिक आलोचक का समकाल सिर्फ देशी या राष्ट्रीय परिदृश्य से ही परिभाषित नहीं होता। इसमें वैश्विक परिदृश्य भी शामिल होता है। सम्भवतः यही कारण है कि नामवर सिंह लगातार आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धान्तों के सम्पर्क में रहे। उनसे संवाद करते रहे। इस पुस्तक में ऐसे कुछ निबन्ध शामिल हैं, जिनसे इस संवाद की बुनियादी प्रवृत्तियों को समझा जा सकता है।
इनमें सबसे पहले तो यही बात ध्यान खींचती है कि नामवर जी ने ‘आधुनिक विश्व’ का अर्थ ‘यूरोप’ या ‘अमरीका’ तक सीमित नहीं किया है। ‘विश्व’ और ‘विश्व साहित्य’ को परिभाषित करते हुए उन्होंने जगह-जगह यूरोपीय राष्ट्रों की अमानवीय क्रूरताओं को संकेतित करनेवाले उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद जैसे पदों का प्रयोग किया है औरएशियाई, अफ्रीकी और लैटिन अमरीकी साहित्य के ब्योरे दिये हैं। जगह-जगह प्रमुख प्रवृत्तियों, लेखकों और रचनाओं का विशेष इन्दराज है और उन पर आत्मीय आलोचनात्मक टिप्पणियाँ हैं। प्रमुख लेखकों पर टिप्पणियाँ करते समय उन्होंने विश्व में उनकी लोकप्रियता या प्रभाव की तुलना में स्थानीय और राष्ट्रीय समाजों में उनके हस्तक्षेप को ज्यादा महत्त्व दिया गया है।
यह भी दिखाई देता है कि अनेक लोकप्रिय और मान्य लेखकों, आलोचकों और सिद्धान्तकारों की मान्यता और लोकप्रियता से वे अनाक्रान्त रहते हैं। भारतीय परम्परा और आधुनिक भारतीय लेखन की ठोस जमीन पर जमे उनके पाँव उन्हें ‘बाहरी’ को अपनाने और उसका मुग्धताहीन मूल्यांकन करने का विवेक और साहस देते हैं।
ये निबन्ध विश्व साहित्य और सिद्धान्तों से एक भारतीय विचारक-आलोचक का गहरा संवाद है। यह एक ऐसा भारत है जहाँ विश्व एक सच्चे साथी के रूप में मौजूद रहता है। यह भारत उस दुनिया का हिस्सा है, जहाँ कोई भी मुल्क, कोई भी समाज विश्व से अलग हो कर नहीं रह सकता। एक साथी विश्व है तो दूसरी ओर शोषक विश्व। एक ओर अपनेपन से भरा विश्व है तो दूसरी ओर पराया बनाये रखनेवाला विश्व। एक ओर जनवादी विश्व है तो दूसरी ओर जनशत्रु विश्व। हिन्दी में पगा-डूबा एक आलोचक जब ऐसे विश्व में उतरता है तो वह एकतान नहीं हो सकता। उसे प्रतिपल एक जटिल, बहुस्तरीय, बहुआयामी विश्व-यथार्थ से सामना करना पड़ता है। इन निबन्धों में हम ऐसे ही नामवर को देखते हैं।
Triveni
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘त्रिवेणी’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की तीन कृतियों मलिक मुहम्मद जायसी, महाकवि सूरदास तथा गोस्वामी तुलसीदास के आलोचनात्मक अंशों का संकलन है।
निबन्धों को इस दृष्टि से संकलित किया गया है कि साहित्य परम्परा की श्रेष्ठता तथा निबन्ध रचना का मानकीकरण हो सके। इनकी शैली, वैयक्तिकता, स्वच्छन्दता तथा भावात्मक पक्ष इन तत्त्वों में समाहित हैं।
प्रस्तुत संकलन निश्चय ही विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book