Aadhunikata Aur Hindi Aalochana
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Author:
Indranath MadanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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बीसवीं सदी में आलोचना की अनेक धारणाओं का विकास हुआ है जिनमें भाषागत और शैलीगत आलोचना, अस्तित्ववादी आलोचना, मिथकीय आलोचना को गिना जाता है। इनके मूल में आधुनिकता की चुनौती है और इनमें आपसी विरोध भी है। हर धारणा की अपनी-अपनी उपलब्धियाँ और सीमाएँ भी हैं जिनका विश्लेषण और विवेचन अनेक दृष्टियों से किया गया है।</p> <p>आलोचना की इन धारणाओं और दृष्टियों का अपना-अपना इतिहास और विकास है जिनकी राह से गुज़रकर एक बात रोशन होने लगती है कि इनका विकास कविता को लेकर अधिक हुआ है, उपन्यास, कहानी और नाटक को लेकर कम। यह शायद इसलिए कि कविता में आधुनिकता की चुनौती का अधिक सामना किया गया है और इसकी आलोचना की परम्परा भी अधिक लम्बी है। नाटक की आलोचना की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। उपन्यास और कहानी की विधा हाल की है और हाल में उपन्यास और कहानी की आलोचना के अन्दाज़ और मिज़ाज भी बदले हैं।</p> <p>आधुनिकता के बोध ने अरस्तू आदि के सिद्धान्तों पर नई रोशनी भी डाली है; लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र पर रोमांटिक बोध की छाप तो लग चुकी है, आधुनिकता की दृष्टि से इसका फिर से आँका जाना अभी शेष है। इस तरह आलोचना फिर से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अपनी अस्मिता को जानने-पहचानने के लिए अनेक दिशाओं में भटकने की गवाही दे रही है।</p> <p>इस पुस्तक में समकालीन आलोचना में आधुनिकता की खोज, उसे समझने और रेखांकित करने के प्रयासों का जायज़ा लिया गया है। चार प्रमुख साहित्यिक विधाओं की आलोचना का ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण करते हुए यह जानने की कोशिश की गई है, कि हिन्दी की आलोचना आधुनिकता को किस रूप में और किस हद तक पहचान पा रही है।
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बीसवीं सदी में आलोचना की अनेक धारणाओं का विकास हुआ है जिनमें भाषागत और शैलीगत आलोचना, अस्तित्ववादी आलोचना, मिथकीय आलोचना को गिना जाता है। इनके मूल में आधुनिकता की चुनौती है और इनमें आपसी विरोध भी है। हर धारणा की अपनी-अपनी उपलब्धियाँ और सीमाएँ भी हैं जिनका विश्लेषण और विवेचन अनेक दृष्टियों से किया गया है।</p>
<p>आलोचना की इन धारणाओं और दृष्टियों का अपना-अपना इतिहास और विकास है जिनकी राह से गुज़रकर एक बात रोशन होने लगती है कि इनका विकास कविता को लेकर अधिक हुआ है, उपन्यास, कहानी और नाटक को लेकर कम। यह शायद इसलिए कि कविता में आधुनिकता की चुनौती का अधिक सामना किया गया है और इसकी आलोचना की परम्परा भी अधिक लम्बी है। नाटक की आलोचना की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है। उपन्यास और कहानी की विधा हाल की है और हाल में उपन्यास और कहानी की आलोचना के अन्दाज़ और मिज़ाज भी बदले हैं।</p>
<p>आधुनिकता के बोध ने अरस्तू आदि के सिद्धान्तों पर नई रोशनी भी डाली है; लेकिन भारतीय काव्यशास्त्र पर रोमांटिक बोध की छाप तो लग चुकी है, आधुनिकता की दृष्टि से इसका फिर से आँका जाना अभी शेष है। इस तरह आलोचना फिर से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अपनी अस्मिता को जानने-पहचानने के लिए अनेक दिशाओं में भटकने की गवाही दे रही है।</p>
<p>इस पुस्तक में समकालीन आलोचना में आधुनिकता की खोज, उसे समझने और रेखांकित करने के प्रयासों का जायज़ा लिया गया है। चार प्रमुख साहित्यिक विधाओं की आलोचना का ऐतिहासिक और वैचारिक विश्लेषण करते हुए यह जानने की कोशिश की गई है, कि हिन्दी की आलोचना आधुनिकता को किस रूप में और किस हद तक पहचान पा रही है।
Book Details
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ISBN9788183618731
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘कवि निराला’ पुस्तक हिन्दी आलोचना में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी भी एक बहुमूल्य देन हैं। आचार्य वाजपेयी ने निराला को ‘शताब्दी का कवि’ और उनके काव्य को ‘शताब्दी काव्य’ कहा था। उन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से निराला के उस महाकवि को खोज लिया था जो गत, आगत और अनागत सभी को एकाकार कर लेता है। टी.एस. इलियट ने भी महान कवि के परिचय में यही कहा था कि महान कवि वह होता है जो आत्मसात् कर, वर्तमान सन्दर्भों में जीता हुआ भावी की पदचाप भी सुन लेता है। आधुनिक हिन्दी कविता का उद्गम भारतेन्दु-द्विवेदी युग से प्रारम्भ होकर छायावाद युग में पहुँचकर नई करवट लेता है और इस युग की कवि चतुष्टयी प्रसाद, निराला, पन्त और महादेवी के चार स्तम्भों पर उस काव्य को गढ़ता है जिसको सांस्कृतिक प्रौढ़ता आगामी कवियों के लिए न केवल आधार बनती है बल्कि उनके अनुकरण और विकास में स्वयं को धन्य मानती है।
Pragatisheel Aalochana Aur Namvar Singh
- Author Name:
Vijay Kumar Bharti
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Description:
प्रगतिशील आलोचना के सन्दर्भ में नामवर सिंह का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने प्रगतिशील आलोचना को विस्तार दिया और उसे नयी ऊर्जा व जीवन्तता प्रदान की। नवीन विचारों, सिद्धान्तों और मूल्यों को आत्मसात करते हुए वे सदैव प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करते रहे, साथ ही प्रगतिशीलता की राह में बाधक तत्त्वों से हिन्दी-समाज को सावधान भी करते रहे।
उनकी प्रगतिशील दृष्टि में वाद, विवाद और संवाद के जरिए ही कोई विमर्श अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। इसे ही मार्क्सवाद में थीसिस, एंटी-थीसिस और सिंथेसिस कहा जाता है। लेकिन मार्क्सवादी विचार को वे अनुकरणमूलक ढंग से नहीं स्वीकारते, वे उसे साहित्यिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं जिसका एक व्यापक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य है।
उनकी प्रगतिशील आलोचना-दृष्टि विभिन्न वादों, सिद्धान्तों और विचारधाराओं से मुठभेड़ करते हुए प्रगतिशीलता की रक्षा करती है। वर्तमान परिस्थितियों में मार्क्सवाद को जीवन्त बनाए रखने के लिए उन्होंने उन जड़ताओं पर भी प्रहार किया जो प्रगतिशील मूल्यों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकती थीं। नए प्रतिमान तलाशते हुए वे परम्परा की खोज करते हैं और आधुनिक प्रवृत्तियों की पड़ताल भी करते रहते हैं।
नामवर सिंह की प्रगतिशील आलोचना जितनी भारतीय सन्दर्भ से जुड़ी है, उतनी ही पाश्चात्य सन्दर्भ से भी। प्रगतिवादी कवियों को प्रयोगवादी शिल्प के खतरों से सचेत करते हुए वे विदेश से आयातित ह्रासोन्मुख भावनाओं, युद्धजनित अनास्था, वैयक्तिक असन्तोष तथा कुंठाओं के खतरे से भी रचनाकारों को सतर्क करते हैं। आलोचना के अन्तर्गत परम्परा के स्वाभाविक विकास के साथ-साथ द्वन्द्वात्मक विकास को महत्व देते हुए वे स्थापित करते हैं कि विकास विरोध से निर्मित होता है, परिपाटी-पालन से नहीं। उनके अनुसार प्रगतिशीलता अपने युग की प्रगतिशील शक्तियों की पहचान पर निर्भर होती है। इसीलिए वे मार्क्सवाद के नाम पर छद्म क्रान्तिकारिता का विरोध करते हैं, परम्परा-पूजा से सावधान करते हैं और सांस्कृतिक विरासत को आलोचनात्मक ढंग से देखने की अपील करते हैं।
यह शोध-ग्रन्थ उनकी प्रगतिशील सोच और उससे उत्पन्न उनकी आलोचना-दृष्टि की जड़ों की खोज है जो नामवर-साहित्य के अलावा उससे सम्बन्धित व्यापक संदर्भ-सामग्री के अध्ययन से संभव हुई है।
Nirala Ke Srajan Simant
- Author Name:
Archana Verma
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Description:
इस किताब की प्रमुख कोशिश निराला को उनकी अपनी भूमि पर देखने और समझने की है, इस आस्था के साथ कि यह अपने आप को भी समझने की शुरुआत है, अपनी परम्परा और अपनी परम्परा की आधुनिकता को।
जिस दुनिया में खड़े होकर आज हम निराला की परम्परागत आधुनिकता को देखते हैं, वह उनकी मूल्यचेतना की सार्थकता और प्रासंगिकता की गवाही स्वयं देती है। जिसे वे जड़वादी दृष्टि कहते थे, उसकी यात्रा की दिशा को वे दूर तक देख और समझ सकते थे। उसके विपक्ष में वे आत्मवाद के साथ खड़े थे तो इसलिए कि वे मानते थे कि अनियंत्रित उपभोग की वह जड़वादी दिशा ही विनाश की है।
‘कुकुरमुत्ता’ में निराला ने कुकुरमुत्ता के ख़ात्मे से उसी अन्त की ओर तथा ‘खजोहरा’ में अपनी ही खुजली से कूदती, फाँदती, भगाई मचाती जड़वादी दृष्टि यानी माया की उपचारहीन जलन की ओर इशारा किया है।
अब उनकी सार्थकता और प्रासंगिकता के बार-बार आविष्कार का समय है। उस दिशा में यह छोटी-सी कोशिश उनकी कविताओं में व्यक्त संसार को मूल रूप से उनके अपने ही निबन्धों, कहानियों, समीक्षाओं आदि में निहित विचारों के सहारे सत्यापित करने की है क्योंकि इससे एक तो उनका अपना मन्तव्य प्रमाणित होता है, दूसरे, आधुनिक आलोचना के पास निराला को जाँचने के लिए ‘अन्तर्विरोध’ के अलावा और कोई अवधारणा न होने के कारण, और उस अवधारणा से मूलतः असहमत होने के कारण लेखिका के पास और कोई उपयुक्त कसौटी नहीं बचती।
Bhatkav ke 67 Varsh
- Author Name:
Satish Chandra Mittal
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- Description: Awating description for this book
Antim Dashak Ki Hindi Kavita
- Author Name:
Ravindranath Mishra
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Description:
बीसवीं सदी का अन्तिम दशक कई तरह से सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का साक्षी रहा। विश्व में समाजवाद के पतन के उपरान्त भारत में उदारीकरण के चलते कई नई चुनौतियाँ हमारी चेतना के समक्ष उपस्थित हुईं। बाज़ारवाद, मीडिया विस्फोट और सूचना तकनीकी के आगमन के कारण भाषिक-संवेदना के तार बिखरने लगे।
इन परिस्थितियों में हिन्दी कवि को इन चुनौतियों का सामना करते हुए वैकल्पिक और सम्पूर्ण भावबोध प्रस्तुत करना था। और, इस दशक की कविता ने यह किया भी। इस पुस्तक में इस दशक में सक्रिय महत्त्वपूर्ण कवियों पर अलग-अलग विचार करते हुए उस संक्रमण काल की कविताओं की मुख्य चिन्ताएँ और सरोकार रेखांकित किए गए हैं।
अरुण कमल, कुमार अम्बुज, अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व, एकान्त श्रीवास्तव, हरीशचन्द्र पांडे, स्वप्निल श्रीवास्तव निलय उपाध्याय, काव्यायनी, अनामिका, गगन गिल और नीलेश रघुवंशी के काव्य पर अलग-अलग अध्यायों में विस्तार से विचार करते हुए लेखक ने उस समय की सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को भी समझने का प्रयास किया है।
कवियों के शिल्प और भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने उनकी सीमाओं और सम्भावनाओं की तरफ़ भी संकेत किया है, और एक पूरे दशक की कविता के सम्पूर्ण को सरल रूप में प्रस्तुत किया है।
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