21vin Shati Ka Hindi Upanyas
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Author:
Pushppal SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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एक ही अध्येता द्वारा उपन्यास-साहित्य के समग्र का परीक्षण कर विशिष्ट कृति के मूल्यांकन की परम्परा का प्रायः अभाव है। एकाध प्रयत्न को छोड़कर उपन्यास-आलोचना में बड़ा शून्य है। इसी शून्य को भरने का प्रयास सुप्रसिद्ध वरिष्ठ आलोचक डॉ. पुष्पपाल सिंह प्रणीत इस ग्रन्थ में हुआ है जिसमें 21वीं शती के उपन्यास-साहित्य की समग्रता में प्रवेश कर, 2013 (के मध्य तक) के प्रकाशित उपन्यासों पर गम्भीरता से विचार का सुचिन्तित निष्कर्ष प्रतिपादित किए गए हैं। उपन्यासों के कथ्य की विराट चेतना पर विचार करते हुए दर्शाया गया है कि आज उपन्यास का क्षितिज कितना विस्तृत हो चुका है। भूमंडल की कदाचित् कोई ही ऐसी समस्या होगी जिस पर हिन्दी उपन्यास में विचार नहीं हुआ हो। भूमंडलीकृत आर्थिकता (इकॉनमी) तथा अमेरिकी संस्कृति के वर्चस्व ने न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया में जो खलबली मचा रखी है, उस सबका सशक्त आकलन ‘21वीं शती का हिन्दी उपन्यास’ प्रस्तुत करता है। उपन्यास का चिन्तन और विमर्श-पक्ष इतना सशक्त है कि उस सबके चुनौतीपूर्ण अध्ययन में पुष्पपाल सिंह अपने पूरे आलोचकीय औज़ारों और पैनी भाषा-शैली के साथ प्रवृत्त होते हैं।</p> <p>उपन्यास के ढाँचे, रूपाकार में भी इतने व्यापक प्रयोग इस काल-खंड के उपन्यास में हुए हैं जिन्होंने उपन्यास की धज ही पूरी तरह बदल दी है। उपन्यास की शैल्पिक संरचना पर हिन्दी में ‘न’ के बराबर विचार हुआ है। प्रस्ततु अध्ययन में विद्वान लेखक ने उपन्यास की शैल्पिक संरचना के परिवर्तनों का भी सोदाहरण विवेचन कर विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। लेखक ने उपन्यास के विपुल का अध्ययन कर उसके श्रेष्ठ के रेखांकन का प्रयास किया है किन्तु फिर भी अपने निष्कर्षों पर अड़े रहने का आग्रह उनमें नहीं है, वे सर्वत्र एक बहस को आहूत करते हैं। उपन्यास-आलोचना के सम्मुख जो चुनौतियाँ हैं, उन पर भी प्रकाश डालते हुए एक विचारोत्तेजक बहस का अवसर दिया गया है। पुस्तक के दूसरे खंड—विशिष्ठ उपन्यास खंड—में वर्षानुक्रम से अड़तीस विशिष्ट उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन उपन्यासों की समीक्षा-शैली में इतना वैविध्य है कि वह अपने ढंग से हिन्दी आलोचना की नई समृद्धि प्रदान करता हुआ लेखकीय गौरव की अभिवृद्धि करता है। पुष्पपाल सिंह की यह कृति निश्चय ही हिन्दी आलोचना के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवदान है।
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एक ही अध्येता द्वारा उपन्यास-साहित्य के समग्र का परीक्षण कर विशिष्ट कृति के मूल्यांकन की परम्परा का प्रायः अभाव है। एकाध प्रयत्न को छोड़कर उपन्यास-आलोचना में बड़ा शून्य है। इसी शून्य को भरने का प्रयास सुप्रसिद्ध वरिष्ठ आलोचक डॉ. पुष्पपाल सिंह प्रणीत इस ग्रन्थ में हुआ है जिसमें 21वीं शती के उपन्यास-साहित्य की समग्रता में प्रवेश कर, 2013 (के मध्य तक) के प्रकाशित उपन्यासों पर गम्भीरता से विचार का सुचिन्तित निष्कर्ष प्रतिपादित किए गए हैं। उपन्यासों के कथ्य की विराट चेतना पर विचार करते हुए दर्शाया गया है कि आज उपन्यास का क्षितिज कितना विस्तृत हो चुका है। भूमंडल की कदाचित् कोई ही ऐसी समस्या होगी जिस पर हिन्दी उपन्यास में विचार नहीं हुआ हो। भूमंडलीकृत आर्थिकता (इकॉनमी) तथा अमेरिकी संस्कृति के वर्चस्व ने न केवल भारत अपितु पूरी दुनिया में जो खलबली मचा रखी है, उस सबका सशक्त आकलन ‘21वीं शती का हिन्दी उपन्यास’ प्रस्तुत करता है। उपन्यास का चिन्तन और विमर्श-पक्ष इतना सशक्त है कि उस सबके चुनौतीपूर्ण अध्ययन में पुष्पपाल सिंह अपने पूरे आलोचकीय औज़ारों और पैनी भाषा-शैली के साथ प्रवृत्त होते हैं।</p>
<p>उपन्यास के ढाँचे, रूपाकार में भी इतने व्यापक प्रयोग इस काल-खंड के उपन्यास में हुए हैं जिन्होंने उपन्यास की धज ही पूरी तरह बदल दी है। उपन्यास की शैल्पिक संरचना पर हिन्दी में ‘न’ के बराबर विचार हुआ है। प्रस्ततु अध्ययन में विद्वान लेखक ने उपन्यास की शैल्पिक संरचना के परिवर्तनों का भी सोदाहरण विवेचन कर विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। लेखक ने उपन्यास के विपुल का अध्ययन कर उसके श्रेष्ठ के रेखांकन का प्रयास किया है किन्तु फिर भी अपने निष्कर्षों पर अड़े रहने का आग्रह उनमें नहीं है, वे सर्वत्र एक बहस को आहूत करते हैं। उपन्यास-आलोचना के सम्मुख जो चुनौतियाँ हैं, उन पर भी प्रकाश डालते हुए एक विचारोत्तेजक बहस का अवसर दिया गया है। पुस्तक के दूसरे खंड—विशिष्ठ उपन्यास खंड—में वर्षानुक्रम से अड़तीस विशिष्ट उपन्यासों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इन उपन्यासों की समीक्षा-शैली में इतना वैविध्य है कि वह अपने ढंग से हिन्दी आलोचना की नई समृद्धि प्रदान करता हुआ लेखकीय गौरव की अभिवृद्धि करता है। पुष्पपाल सिंह की यह कृति निश्चय ही हिन्दी आलोचना के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवदान है।
Book Details
-
ISBN9788183617888
-
Pages404
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: डॉ. देवीशंकर अवस्थी के चिन्तन और विवेचन का कैनवस अत्यन्त विस्तृत है—सैद्धान्तिक से लेकर व्यावहारिक आलोचना तक उत्तरोत्तर गूढ़ और चुनौतीपूर्ण सवालों से उन्होंने मुठभेड़ की है। कालिदास, निराला, महादेवी वर्मा, प्रसाद, प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमचन्द से लेकर ग्रीक पौराणिक गाथाएँ तक उनकी लेखनी के प्रिय विषय हैं। इसके साथ उनकी सरस आलोचनात्मक वृत्ति वृन्दावन, मथुरा, मैसूर, ताजमहल, रानीखेत, मसूरी आदि के सौन्दर्य में भी रमी है। पर उनके आलोचक का सबसे उल्लेखनीय गुण यह है कि वह नव्यता और सम-सामयिकता की चेतना से अनुप्राणित है। इसके चलते उनकी दृष्टि एक नई ऊर्जा और सार्थकता से लैस है। यही चीज़ उन्हें हमेशा प्रासंगिक बनाए रखेगी। डॉ. अवस्थी ने साहित्य की सभी विधाओं को मूल्यवान ढंग से समृद्ध किया है, जैसे—आलोचना, रंग-समीक्षा, कविता, नाटक, प्रहसन, कहानी, रिपोर्ताज, पत्र और डायरी।
Meghdoot : Ek Purani Kahani
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

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Description:
महाकवि कालिदास कृत ‘मेघदूत’ के अनुवादों और टीकाओं की हिन्दी में कमी नहीं, पर यह पुस्तक न तो उसका अनुवाद मात्र है और न महज़ टीका। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी के ऐसे वाङ्मय–पुरुष हैं जिन्होंने न केवल समूचे मध्यकालीन साहित्येतिहास को अपनी शोधालोचना का विषय बनाया बल्कि संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य की कुछ कालजयी कृतियों का पुन:सृजन भी किया।
‘मेघदूत : एक पुरानी कहानी’ महाकवि कालिदास की अमर काव्य–कृति का ऐसा ही पुन:सृजन है। द्विवेदी जी ने इसमें ‘मेघदूत’ के कथा–प्रसंगों की व्याख्या के बहाने उन अछूते सन्दर्भों का भी उद्घाटन किया है जो इसकी रचना–प्रक्रिया के दौरान कालिदास के मन में रहे होंगे। तत्कालीन राजनीतिक–सामाजिक वातावरण, जनसमाज की आर्थिक स्थिति, विद्वज्जनों के वैचारिक अन्तर्विरोध और मन–प्राण को आह्लादित कर देनेवाली वे रससिक्त उद्भावनाएँ जो रसज्ञ पाठक को कल्पनातीत स्पर्शानुभूति तक ले जा सकें—सभी कुछ इसमें छविमान है। लगता है, वह सब अनकहा जिसे कालिदास कहना चाहते थे, यहाँ स्पष्टत: कह दिया गया है।
आचार्य द्विवेदी की प्रकाण्ड मेधा, विनोदवृत्ति और विलक्षण सृजनात्मक क्षमता से स्पृश्य ‘मेघदूत’ की यह कहानी निस्सन्देह एक अविस्मरणीय कृति है।
Harishankar Parsai : Desh Ke Is Daur Mein
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

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Description:
देश के इस दौर में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-निबन्धों की विवेचना है। यह वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि के साथ विवेचना की है। परसाई पर केन्द्रित पुस्तकों में इस पुस्तक का अपना अलग स्थान है। बकौल ज्ञानरंजन ‘यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।’
त्रिपाठी जी का मानना है कि ‘परसाई का रचनाकार एक इतिहास-पुरुष है जो अपने समय का सबकुछ देख रहा है, अपने युग का चित्र बना रहा है। विवेक के साथ।’ वे कहते हैं कि ‘परसाई का व्यंग्य असहज-असुन्दर का उद्घाटन करके सहज-सुन्दर को गढ़ने का प्रयास करता है।’
लगभग चालीस वर्षों में फैली परसाई की रचनात्मकता को इस पुस्तक में विश्वनाथ त्रिपाठी ने जितने आत्मीय ढंग से जान-समझकर हम तक पहुँचाया है, उससे परसाई हमें एक नए सिरे से समझ आते हैं। वर्तमान की उनकी समझ, अपने पात्रों को लेकर उनकी संवेदना की व्यापकता, मनोविकारों का चित्रण, उनके व्यंग्य-निबन्धों के विषयों का असीम संसार, मानवीय करुणा, चरित्र-चित्रण और उनके सौन्दर्यबोध को उद्धरणों के साथ जिस तरह यहाँ विश्लेषित किया गया है, वह अपूर्व है।
यह इस पुस्तक का परिवर्द्धित संस्करण है जिसमें परसाई के जीवन-वृत्त के साथ भूमिका के रूप में उनके व्यंग्य पर केन्द्रित एक लम्बा आलेख भी शामिल किया गया है।
Dharm Nirpekshta Banam Rashtriya Sanskriti
- Author Name:
Kuber Nath Rai
- Book Type:

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Description:
धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के अधिकतर निबन्ध समय, समाज साहित्य अर्थात् समग्र जीवन के वास्तविक सौन्दर्य के अन्वेषण में संलग्न हैं।
श्री राय भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य के प्रति भरपूर सम्मान भाव रखते हैं। देशबोध और मैथिली शरण गुप्त शीर्षक निबन्ध में वे देशबोध अर्थात् भारतबोध की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। यह बोध दम, त्याग और अप्रमाद पर आधारित है और कतई संकीर्ण नहीं है।
राजनीतिक मुद्दे हों, इतिहास के सवाल हों या साहित्य-विवेचन; इन सभी गम्भीर विषयों में श्री राय के बहु-पठित और गम्भीर विश्लेषक होने का प्रमाण मिलता है। भारत-बोध या देशप्रेम के आसपास विचरण करती उनकी चिन्तना अनेक पूर्वग्रहों का सतर्क उन्मूलन करती है। यह सत्य है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के कई निबन्धों में वैचारिक गरिष्ठता अधिक है फिर भी मौलिक स्थापनाओं के चलते वे पठनीय बने रहते हैं। आज के संक्रमणशील यथार्थ और वैचारिक द्वन्द्व को समझने और वांछित सन्देश सम्प्रेषित करने में वे प्रासंगिक हैं। श्री राय के ये निबन्ध विस्मृति के आखेट बने रह जाते हैं। इन निबन्धों से असहमति की गुंजाइश कम नहीं है लेकिन श्री राय की अध्ययनशीलता, तर्कपूर्ण विश्लेषण, मौलिक वैचारिकता की उपेक्षा सम्भव नहीं है। श्री राय ने लोक साहित्य और संस्कृत वाङ्मय का बहुत सहारा न लेते हुए अपने ललित निबन्धों का जो विशेष मुहावरा गढ़ा था, वह इन रचनाओं में भी अपनी ऊर्जा और दीप्ति के साथ वर्तमान है।
डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'
Bhasha-Vigyan Ka Rasayan
- Author Name:
Kailash Nath Pandey
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत पुस्तक ‘भाषा-विज्ञान का रसायन’ अखिल देशीय स्तर के पाठक्रम अर्थात् जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, इलाहाबाद, अलीगढ़, लखनऊ, अवध, कानपुर, आगरा, पूर्वांचल, गोरखपुर, सागर, रीवा, जबलपुर, जयपुर, पूना, मुम्बई, नागपुर, पटना, राँची, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ तथा विश्वभारती, शान्तिनिकेतन आदि विश्वविद्यालयों के बी.ए., (हिन्दी तथा संस्कृत) एम.ए. (हिन्दी तथा संस्कृत) के सम्पूर्ण पाठ्यक्रमों को अपने भीतर मुकम्मल रूप में तो समेटती ही है, हर प्रान्त की हिन्दी माध्यम की पीसीएस, आईएएस तथा यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा सन् 2004 से अखिल भारतीय स्तर पर बदले गए नए पाठ्यक्रमों नेट, स्लेट आदि को भी अपने में समाहित कर भाषा-विज्ञान में अपनी प्रकृति की पुस्तकों में गम्भीर पुस्तक बन गई है।
पुस्तक की भाषा जीवन्त, शैली सजीव और तथ्य प्रामाणिक तथा ज़मीनी हैं। इस कृति की शैली निजी तथा भिन्न है। लेखक तथ्यों को करीने से सिलसिलेवार उठाते हैं, उन्हें पता है कहाँ क्या देना है, उन्हें यह भी पता है कि ज़रा-सी चूक पठनीयता की हत्या कर देगी। इतने जटिल विषय और उसके रोएँ-रेशे को नितान्त सरल भाषा, मोहक शैली, आत्मीय टोन और लय में बिना किसी रूमानी अतिरंजना, उग्रता को प्रस्तुत करनेवाली इतनी सुघर और बढ़िया पुस्तकें कम हैं। कुल मिलाकर अपने ढंग का रचनात्मक स्वाद देनेवाली यह ठोस और सार्थक कृति है।
Dhoop Chhanh
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
‘धूपछाँह’ हिन्दी साहित्य में अपने ढंग की एक दुर्लभ कृति है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा समय-समय पर दूसरी भाषाओं की रचनाओं से प्रेरित हो किशोरों के लिए लिखी गई इन कविताओं में ओजस्विता तो है ही, प्रांजल प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि का छंद-विधान और भाव-सम्प्रेषण भी अद्भुत है।
राष्ट्रकवि ने अपनी इन कविताओं की पृष्ठभूमि के बारे में लिखा है—“ ‘धूपछाँह’ में धूप कम और छाया अधिक है। इसकी सोलह कविताओं में से दो (‘दो बीघा ज़मीन’ और ‘पुरातन भृत्य’) के मूल लेखक रवि बाबू, दो (‘तन्तुवाय’ और ‘तीन दर्द’) की मूल लेखिका श्रीमती सरोजिनी नायडू और एक (‘नींद’) के मूल लेखक गॉड्फ्रे नामक एक पाश्चात्य कवि हैं। ‘बच्चे का तकिया’ और ‘वर-भिक्षा’ सत्येन्द्रनाथ दत्त की बांग्ला कविताओं से ली गई हैं, मगर इनके मूल रचयिता, क्रमशः मार्सेलिन बाल्मोर और नगूची हैं। ‘पानी की चाल’ नामक रचना भी सर्वथा मौलिक नहीं कही जा सकती, क्योंकि यह रॉबर्ट सदी और अकबर इलाहाबादी के अनुकरण पर लिखी गई है। ‘कवि का मित्र’ रचना भी, जिसने मेरे कितने ही घनिष्ठ मित्रों को सिर खुजलाते हुए कुछ सोचने को लाचार किया है, सोलह आना मेरी ही स्वानुभूति नहीं है। ऐसे चरित्र का वर्णन दो-एक अंग्रेज़ी लेखकों और कवियों ने भी किया है जिनमें एक का नाम जॉन गॉड्फ्रे सैक्से है। इसी प्रकार ‘रौशन बे की बहादुरी’ का प्लॉट लांगफेलो की एक कविता से लिया गया है।”
इस तरह देखें तो पुस्तक में संकलित रचनाएँ अपने कैनवस पर अपने विविध रंगों में परिचित दुनिया की आत्मीय और अविस्मरणीय रचनाएँ हैं। निस्सन्देह, राष्ट्रकवि दिनकर की यह कृति युवा पीढ़ी को एक नया सन्देश देगी, देती रहेगी।
Dhumil Ki Kavita Mein Virodh Aur Sangharsh
- Author Name:
Nilam Singh
- Book Type:

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Description:
धूमिल की कविता उस आम आदमी की कविता है जो आज की राजनीति के केन्द्र में है। कभी हाशिये पर रखे जानेवाले इस आम आदमी को संसद से लेकर सड़क तक जिस प्रकार धूमिल ने देखा, शायद उसका पुनर्नवीकरण हम आज की राजनीति में देख रहे हैं। ऐसे में धूमिल की कविता के विविध पहलुओं को उजागर करती यह किताब धूमिल की कविता में विरोध और संघर्ष छोटी परन्तु मुकम्मल दास्तान प्रस्तुत करती है।
जैसा कि नामवर जी ने आमुख में इंगित किया है—धूमिल अपने दौर के सबसे समर्थ कवियों में एक है। ऐसे कवि जिनकी कविता की अनुगूँज साठोत्तरी कविता को प्रतिबिम्बित करती है, पर उससे भी आगे जाकर भविष्य का एक रास्ता तलाशने की राह दिखाती है। काशीनाथ सिंह धूमिल की साहित्य-यात्रा के सबसे घनिष्ठ सहचर थे और उनसे लेखिका की बातचीत में धूमिल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की सार्थक पहचान व्यंजित होती है। नामवर जी की आलोचना-दृष्टि ने धूमिल की कविता की विशिष्टता को पहली बार साहित्य संसार के सामने रखा था और इतने अरसे बाद उनकी नज़र से धूमिल का गुज़रना सुखद संयोग है।
संसद एवं राजनीति के बदलते परिदृश्य में धूमिल की कविता पर आलोचना की यह किताब धूमिल के माध्यम से अपने दौर की समीक्षा है।
Jo Gopi Madhu Ban Gayi
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम को लेकर, यमक अलंकार से युक्त एक अद्भुत दोहा-शतक
Kabir-Kavya Main Kaalbodh
- Author Name:
Sumita Kukreti
- Book Type:

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Description:
कबीर का कालविषयक चिन्तन अद्वितीय है। कबीर ने काल के सन्दर्भ को साधारण मनुष्यों से लेकर सुलतानों अर्थात् सत्ता-प्रतिष्ठानों तक कुशलता से जोड़े और यह दिखाया कि सज्जनों को काल त्रस्त नहीं करता, वे कालभय से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं लेकिन अन्यायी और अत्याचारी हमेशा कालभय से गहरे सन्त्रस्त रहते हैं। इस पुस्तक में सुमीता कुकरेती ने यह रेखांकित किया है कि कबीर जैसे कालजयी कवि ने जनमानस को पहचान कर काल का रचनात्मक विश्लेषण किया। कबीर के लिए मृत्यु मानव-जीवन का ऐसा शाश्वत सत्य है जिसके माध्यम से उन्होंने जीवन की महत्ता का प्रतिपादन किया। कबीर का मुख्य उद्देश्य तदयुगीन मानवीय मूल्यों के क्षरण, सामाजिक विषमताओं और अपसंस्कृतियों के बरक्स सही जीवन जीने में विश्वास, समता और न्याय को रखना था। इसीलिए कबीर करुणा का अचूक इस्तेमाल करते हैं और कहीं-कहीं तीखी फटकार लगाते हैं। वह शोषक और अन्यायी वर्ग को उनके जीवन की क्षणभंगुरता समझाकर डराते भी हैं और मानवीय जीवन को उचित तरीके से जीने की राह भी दिखाते हैं।
‘कबीर-काव्य में कालबोध’ पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें अध्ययन-क्षेत्र को केवल युग-विशेष तक सीमित नहीं रखा गया है बल्कि कबीर के समकालीन कवियों के अतिरिक्त देशी-विदेशी आधुनिक कवियों और आलोचकों की दृष्टियों का गहरा अध्ययन और उनका तार्किक प्रयोग भी किया गया है। यह इसका वह उल्लेखनीय पक्ष है जो इसे परम्परित शुष्क और प्रायः नकलची शोध-प्रबन्धों और कथित आलोचनात्मक ग्रन्थों से अलग करता है। कबीर की कविता की अनउद्घाटित खूबियों को उद्घाटित करने वाला यह मौलिक कार्य कबीर-काव्य के पैराडाइम को विस्तृत करता है और ऐसा निर्भ्रान्त विमर्श भी रचता है जिससे सार्थक बहस सम्भव होती है। यहाँ हम कबीर के माध्यम से पूर्व मध्यकाल यानी भक्तिकालीन कविता को समझने की विशिष्ट आलोचनात्मक सरणी से भी परिचित होते हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ‘कबीर-काव्य में कालबोध’ एक महान रचनाकार को समझने की नई साहित्यिक पहल है।
पाण्डित्यपूर्ण दार्शनिक विषय को पठनीय बनाते हुए सुमीता कुकरेती ने कबीर का विचार-सम्पन्न समाजशास्त्रीय विवेचन किया है। उन्होंने कबीर काव्य के वास्तविक स्वभाव को जिस गहरी विश्लेषण-दृष्टि के साथ उकेरा है उसमें विचारोत्तेजक बौद्धिक परामर्श मौजूद है। उनके वस्तुनिष्ठ निष्कर्ष और मौलिक स्थापनाएँ विशेष अर्थ रखती हैं।
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