Rajabadal
(0)
Author:
Bimal MitraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
299
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Available
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हिन्दी और बांग्ला में समान रूप से लोकप्रिय कथाकार विमल मित्र के उपन्यास राजाबदल में न कोई राजा है और न कोई राज्य; सिर्फ एक स्कूल है—बलरामपुर हाई स्कूल और उस स्कूल के संस्थापक हैं—गौर पंडित। एक बाप जिस तरह अपने बेटे के निर्माण में अपना सर्वस्व लगा देता है उसी तरह गौर पंडित अपने खून-पसीने से सींच-सींचकर स्कूल का यह बिरवा खड़ा करते हैं। इसके लिए उन्होंने भीख माँगी, पत्नी के जेवर बेचे और क्या-कुछ नहीं किया! लेकिन जैसे-जैसे स्कूल का विस्तार होता गया, गौर पंडित के अधिकार कम होते गए और एक दिन उन्हें स्कूल की कमिटी से हट जाना पड़ा। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने हैरानी से देखा कि मालिक बदलने के साथ-साथ जैसे स्कूल का सब-कुछ बदल गया है, भला और बुरा सब-कुछ। और तब जैसे वे तड़प उठे; उन्हें लगा कि उनका मानस-पुत्र पतन के रास्ते पर जा रहा है। वे इस सारी स्थिति को सह नहीं सके और एक अनिर्वचनीय पीड़ा मन में लिये गाँव से विदा हो जाते हैं। चलते समय बार-बार एक प्रश्न उनके मन में उठता है : राजा बदलने के साथ क्या राज्य भी पूरी तरह बदल जाता है? क्या राज्य के लोग तक बदल जाते हैं? इतना ही नहीं, उनका भला-बुरा, शुभ-अशुभ सब कुछ बदल जाता है? गौर पंडित के इस प्रश्न में लेखक ने आज की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या को रूपायित किया है। सर्वथा रोचक और भावभीना उपन्यास।
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हिन्दी और बांग्ला में समान रूप से लोकप्रिय कथाकार विमल मित्र के उपन्यास राजाबदल में न कोई राजा है और न कोई राज्य; सिर्फ एक स्कूल है—बलरामपुर हाई स्कूल और उस स्कूल के संस्थापक हैं—गौर पंडित। एक बाप जिस तरह अपने बेटे के निर्माण में अपना सर्वस्व लगा देता है उसी तरह गौर पंडित अपने खून-पसीने से सींच-सींचकर स्कूल का यह बिरवा खड़ा करते हैं। इसके लिए उन्होंने भीख माँगी, पत्नी के जेवर बेचे और क्या-कुछ नहीं किया! लेकिन जैसे-जैसे स्कूल का विस्तार होता गया, गौर पंडित के अधिकार कम होते गए और एक दिन उन्हें स्कूल की कमिटी से हट जाना पड़ा। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने हैरानी से देखा कि मालिक बदलने के साथ-साथ जैसे स्कूल का सब-कुछ बदल गया है, भला और बुरा सब-कुछ। और तब जैसे वे तड़प उठे; उन्हें लगा कि उनका मानस-पुत्र पतन के रास्ते पर जा रहा है। वे इस सारी स्थिति को सह नहीं सके और एक अनिर्वचनीय पीड़ा मन में लिये गाँव से विदा हो जाते हैं। चलते समय बार-बार एक प्रश्न उनके मन में उठता है : राजा बदलने के साथ क्या राज्य भी पूरी तरह बदल जाता है? क्या राज्य के लोग तक बदल जाते हैं? इतना ही नहीं, उनका भला-बुरा, शुभ-अशुभ सब कुछ बदल जाता है? गौर पंडित के इस प्रश्न में लेखक ने आज की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या को रूपायित किया है। सर्वथा रोचक और भावभीना उपन्यास।
Book Details
-
ISBN9789360869489
-
Pages197
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इक्कीस साल का पृथ्वी एक अधेड़ और रहस्यमयी अघोरी ओम् शास्त्री की तलाश कर रहा है, जिसे पकड़कर भारत के एक सुनसान द्वीप पर अत्याधुनिक सुविधाओं के बीच भेज दिया गया | विशेषज्ञों की एक टीम ने जब उस अघोरी को नशे की दवा दी और पूछताछ के लिए सम्मोहित किया, तो उसने दावा किया कि वह सभी चार युगों-सतयुग, त्रेता, द्वापर व कलियुग–(हिंदू धर्म के अनुसार चार युग) को देख चुका है और रामायण तथा महाभारत की घटनाओं में हिस्सा ले चुका है | जीवन के बाद मृत्यु के नियम को भी बेअसर साबित करनेवाले ओम् के अविश्वसनीय अतीत से जुड़े खुलासे सभी को हैरान कर देते हैं। उस टीम को यह भी पता चला कि ओम् हर युग के दूसरे अमर लोगों की भी तलाश कर रहा है। ऐसे विचित्र रहस्य अगर सामने आ गए तो प्राचीन धारणाएँ हिल जाएँगी और भविष्य की दिशा ही बदल जाएगी। तो यह ओम् शास्त्री कौन है? उसे पकड़ा क्यों गया? पृथ्वी उसे क्यों ढूँढ़ रहा है? सवार हो जाइए ओम् शास्त्री के रहस्यों, पृथ्वी की तलाश और हिंदू पौराणिक कथाओं के रहस्यों से भरे अन्य अमर लोगों के कारनामों की इस नाव पर, और चलिए एक रोचक और रोमांचक यात्रा पर|
Neem Ka Ped
- Author Name:
Rahi Masoom Raza
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“मैं अपनी तरफ़ से इस कहानी में कहानी भी नहीं जोड़ सकता था। इसीलिए इस कहानी में आपको हदें भी दिखाई देंगी और सरहदें भी। नफ़रतों की आग में मोहब्बत के छींटे दिखाई देंगे। सपने दिखाई देंगे तो उनका टूटना भी।...और इन सबके पीछे दिखाई देगी सियासत की काली स्याह दीवार। हिन्दुस्तान की आज़ादी को जिसने निगल लिया। जिसने राज को कभी भी सु-राज नहीं होने दिया। जिसे हम रोज़ झंडे और पहिए के पीछे ढूँढ़ते रहे कि आख़िर उसका निशान कहाँ है? गाँव मदरसा ख़ुर्द और लछमनपुर कलाँ महज़ दो गाँव-भर नहीं हैं और अली ज़ामिन खाँ और मुस्लिम मियाँ की अदावत बस दो ख़ालाज़ाद भाइयों की अदावत नहीं है। ये तो मुझे मुल्कों की अदावत की तरह दिखाई देती है, जिसमें कभी एक का पलड़ा झुकता दिखाई देता है तो कभी दूसरे का और जिसमें न कोई हारता है, न कोई जीतता है। बस, बाक़ी रह जाता है नफ़रत का एक सिलसिला... “मैं शुक्रगुज़ार हूँ उस नीम के पेड़ का जिसने मुल्क को टुकड़े होते हुए भी देखा और आज़ादी के सपनों को टूटे हुए भी देखा। उसका दर्द बस इतना है कि वह इन सबके बीच मोहब्बत और सुकून की तलाश करता फिर रहा है।”
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