Kaisi Aagi Lagai
(0)
Author:
Asghar WajahatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
295
₹ 236 (20% off)
Available
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उपन्यास का महत्त्व दरअसल आजकल भी इसलिए बना हुआ है कि उपन्यास एक समानान्तर जीवन की परिकल्पना करते हैं। इस सन्दर्भ में असग़र वजाहत के उपन्यास ‘कैसी आगी लगाई’ में जीवन की विशद व्याख्या है, जीवन का विस्तार है और तमाम अन्तर्विरोधों के बीच से मानव-गरिमा और श्रेष्ठता के कलात्मक संकेत मिलते हैं। पिछले तीस साल से कहानियाँ और उपन्यासों के माध्यम से अपनी विशेष पहचान बना चुके असग़र वजाहत ने ‘कैसी आगी लगाई’ में विविधताओं से भरा एक जीवन हमारे सामने रखा है। यह जीवन बिना किसी शर्त पाठक के सामने खुलता चला जाता है। कहीं-कहीं बहुत संवेदनशील और वर्जित माने जानेवाले क्षेत्रों में उपन्यासकार पाठक को बड़ी कलात्मकता और सतर्कता से ले जाता है और कुछ ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो सम्भवतः हिन्दी उपन्यास में इससे पहले नहीं आए हैं। उपन्यास का ढाँचा परम्परागत है लेकिन दर्शक के सामने विभिन्न प्रसंग जिस तरह खुलते हैं, वह अत्यन्त कलात्मक है, एक व्यापक जीवन में लेखक जिस प्रसंग को उठाता है, उसे जीवन्त बना देता है। ‘कैसी आगी लगाई’ में साम्प्रदायिकता, छात्र-जीवन, स्वातंत्र्योत्तर राजनीति, सामन्तवाद, वामपन्थी राजनीति, मुस्लिम समाज, छोटे शहरों का जीवन और महानगर की आपाधापी के साथ-साथ सामाजिक अन्तर्विरोधों से जन्मा वैचारिक संघर्ष भी हमारे सामने आता है। उपन्यास मानवीय सरोकारों और मानवीय गरिमा के कई पक्षों को उद्घाटित करता है। जीवन और जगत के विभिन्न कार्य-व्यापारों के बीच कथा-सूत्र एक ऐसा रोचक ताना-बाना बुनते हैं कि पाठक उनमें डूबता चला जाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ उन पाठकों के लिए आवश्यक है जो उपन्यास विधा से अतिरिक्त आशाएँ रखते हैं।
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उपन्यास का महत्त्व दरअसल आजकल भी इसलिए बना हुआ है कि उपन्यास एक समानान्तर जीवन की परिकल्पना करते हैं। इस सन्दर्भ में असग़र वजाहत के उपन्यास ‘कैसी आगी लगाई’ में जीवन की विशद व्याख्या है, जीवन का विस्तार है और तमाम अन्तर्विरोधों के बीच से मानव-गरिमा और श्रेष्ठता के कलात्मक संकेत मिलते हैं।
पिछले तीस साल से कहानियाँ और उपन्यासों के माध्यम से अपनी विशेष पहचान बना चुके असग़र वजाहत ने ‘कैसी आगी लगाई’ में विविधताओं से भरा एक जीवन हमारे सामने रखा है। यह जीवन बिना किसी शर्त पाठक के सामने खुलता चला जाता है। कहीं-कहीं बहुत संवेदनशील और वर्जित माने जानेवाले क्षेत्रों में उपन्यासकार पाठक को बड़ी कलात्मकता और सतर्कता से ले जाता है और कुछ ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो सम्भवतः हिन्दी उपन्यास में इससे पहले नहीं आए हैं।
उपन्यास का ढाँचा परम्परागत है लेकिन दर्शक के सामने विभिन्न प्रसंग जिस तरह खुलते हैं, वह अत्यन्त कलात्मक है, एक व्यापक जीवन में लेखक जिस प्रसंग को उठाता है, उसे जीवन्त बना देता है।
‘कैसी आगी लगाई’ में साम्प्रदायिकता, छात्र-जीवन, स्वातंत्र्योत्तर राजनीति, सामन्तवाद, वामपन्थी राजनीति, मुस्लिम समाज, छोटे शहरों का जीवन और महानगर की आपाधापी के साथ-साथ सामाजिक अन्तर्विरोधों से जन्मा वैचारिक संघर्ष भी हमारे सामने आता है। उपन्यास मानवीय सरोकारों और मानवीय गरिमा के कई पक्षों को उद्घाटित करता है। जीवन और जगत के विभिन्न कार्य-व्यापारों के बीच कथा-सूत्र एक ऐसा रोचक ताना-बाना बुनते हैं कि पाठक उनमें डूबता चला जाता है।
‘कैसी आगी लगाई’ उन पाठकों के लिए आवश्यक है जो उपन्यास विधा से अतिरिक्त आशाएँ रखते हैं।
Book Details
-
ISBN9788126713578
-
Pages392
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Mamta Kaliya
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- Description: ‘सच्चा झूठ’ उपन्यास का विषय कोरोना काल है, और यह कहानियाँ सुनाता है उन लोगों की जो अपनी-अपनी जगहों पर, अपनी-अपनी हैसियत और हदों के साथ इस स्याह समय से गुज़रे, जिन्होंने इसकी तकलीफ़ों, डरों, सदमों और दुखों को कभी हिम्मत से तो कभी आशंकाओं के साथ झेला। यानी कथा है हम सब की। बहुत समय नहीं बीता है, जब सारी दुनिया अचानक कोरोना नाम की इस ख़ौफ़नाक महामारी के सामने असहाय हो गई थी। अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े, सब अचानक ऐसे हालात के सामने आ खड़े हुए जिनसे निबटने का तरीका किसी को नहीं आता था। एक नए ढंग की छुआछूत ने हम सबको अपनों तक से दूर कर दिया। शारीरिक दूरी की जगह सामाजिक दूरी ने ले ली और उन तमाम धागों को उधेड़ दिया, जो सामान्य समय में हमें एक समाज बनाते थे। इस उपन्यास में अलग-अलग पात्रों के हवाले से इस पूरे दौर की एक मुकम्मल तस्वीर प्रस्तुत की गई है। यहाँ एक तरफ़ अगर मौत का भय है, तो दूसरी तरफ़ हमारी सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक उलझनें। कहीं पारिवारिक सम्बन्धों की दरकन दिखती है तो कहीं मनुष्यता के अनुकरणीय उदाहरण भी–यह उपन्यास इन सभी पहलुओं को बहुत बारीकी से अंकित करता है। एक प्रेम-कथा भी इस उपन्यास का हिस्सा है जो कोरोना के इसी भयानक दौर में धीर-धीरे परवान चढ़ती है, और कोरोना की चुनौती के साथ सामाजिक भेदभाव की बाधा को भी सफलतापूर्वक पार करती है।
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