Book Set
Complete Collection : 4 Books in this Book Set
Arey...O’Henry
Arey...O’Henry
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Author Name:
Gulzar
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Book Type:

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Description:
आकार में छोटी लेकिन असर में गहरी ओ’ हेनरी की कहानियों में हमें वे ही लोग मिलते हैं, जिन्हें हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं; अपनी उम्मीदों, नाउम्मीदियों, सपनों, हादसों और रहस्यों की पोटलियों को सँभाले फिरते आम लोग। लेकिन उनकी जिन्दगी में भी कुछ होता है जो कहानी बन जाता है; कुछ हैरान करनेवाला, कुछ ऐसा जो हमें गुदगुदा देता है, कुछ सिखा जाता है। अमेरिकी पृष्ठभूमि में लिखी ओ’ हेनरी की ऐसी ही कुछ कहानियों को चुनकर गुलज़ार ने ड्रामों की शक्ल दी और जब ये ड्रामे मंच पर आए तो देखनेवालों ने कुछ नया-सा महसूस किया। नाटक में ढालते हुए उन्होंने कहानी को नहीं बदला, सिर्फ़ परिवेश को बदला, पात्रों को हिन्दुस्तानी पहचान दी; और उन्हें हमारे भारतीय ईथॉस से जोड़ा। नतीजा ये कि ‘अरे ओ’ हेनरी’ पुस्तक के इन छोटे-छोटे ड्रामों में जितने ओ’ हेनरी हैं, उतने ही गुलज़ार भी हैं, जितनी कहानी है, उतना ड्रामा भी है, लेकिन जितना हिन्दुस्तान है, उतना अमेरिका नहीं, यह कमाल गुलज़ार का है जिसे देखनेवालों ने जितना जाना, उतना पढ़नेवाले भी महसूस करेंगे।
Harishankar Parsai : Desh Ke Is Daur Mein
Harishankar Parsai : Desh Ke Is Daur Mein
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Author Name:
Vishwanath Tripathi
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Book Type:

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Description:
देश के इस दौर में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-निबन्धों की विवेचना है। यह वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि के साथ विवेचना की है। परसाई पर केन्द्रित पुस्तकों में इस पुस्तक का अपना अलग स्थान है। बकौल ज्ञानरंजन ‘यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।’
त्रिपाठी जी का मानना है कि ‘परसाई का रचनाकार एक इतिहास-पुरुष है जो अपने समय का सबकुछ देख रहा है, अपने युग का चित्र बना रहा है। विवेक के साथ।’ वे कहते हैं कि ‘परसाई का व्यंग्य असहज-असुन्दर का उद्घाटन करके सहज-सुन्दर को गढ़ने का प्रयास करता है।’
लगभग चालीस वर्षों में फैली परसाई की रचनात्मकता को इस पुस्तक में विश्वनाथ त्रिपाठी ने जितने आत्मीय ढंग से जान-समझकर हम तक पहुँचाया है, उससे परसाई हमें एक नए सिरे से समझ आते हैं। वर्तमान की उनकी समझ, अपने पात्रों को लेकर उनकी संवेदना की व्यापकता, मनोविकारों का चित्रण, उनके व्यंग्य-निबन्धों के विषयों का असीम संसार, मानवीय करुणा, चरित्र-चित्रण और उनके सौन्दर्यबोध को उद्धरणों के साथ जिस तरह यहाँ विश्लेषित किया गया है, वह अपूर्व है।
यह इस पुस्तक का परिवर्द्धित संस्करण है जिसमें परसाई के जीवन-वृत्त के साथ भूमिका के रूप में उनके व्यंग्य पर केन्द्रित एक लम्बा आलेख भी शामिल किया गया है।
Gulzar Ke Geet
Gulzar Ke Geet
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Author Name:
Gulzar
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Book Type:

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Description:
गुलज़ार ने हिन्दी फ़िल्मों में गीतों की एक अलग रवायत शुरू की जो आज तक सिर्फ़ उन्हीं की है। कोई और गीतकार न उसकी नक़ल कर पाया, और न उसे कोई और शक्ल दे सका। गुलज़ार पर जो शुरू होता है, वह गुलज़ार पर ही ख़त्म होता है। ‘गुलज़ार के गीत’ में उनके वे गीत शामिल हैं जो दशकों से गाए-बजाए जाते रहे हैं और जितने लोकप्रिय वे तब थे, उतने ही आज भी हैं। ‘मोरा गोरा अंग लई ले’, ‘रोज़ अकेली आए’, ‘हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू’ और इन जैसे अनेक गीत हैं जो फ़िल्मों से निकलकर हमारे भाव-जगत का अभिन्न हिस्सा हो गए। संकलन में शामिल गीतों को उनकी प्रकृति के अनुसार दो भागों में प्रस्तुत किया गया है—एक, ‘भाव-गीत’ और दूसरा, ‘रंगारंग’। दूसरे हिस्से में वे गीत हैं जो अपने खिलंदड़पने में भी ज़िन्दगी और दुनियादारी के बारे में गहरी फ़लसफ़ियाना बातें करते हैं, और शायरी को भी एक नई सूरत बख़्शते हैं। गीतों के साथ यहाँ पाठक भूषण बनमाली द्वारा लिखा गया गुलज़ार के बारे में एक आलेख और स्वयं गुलज़ार द्वारा लिखा गया एक दिलचस्प लेख ‘एक गीत का जन्म’ भी पाएँगे। इस लेख में ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ गीत की कहानी बयान की गई है।
Bharatiya Shiksha
Bharatiya Shiksha
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Author Name:
Rajendra Prasad
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Book Type:

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Description:
‘भारतीय शिक्षा’ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के शिक्षा-सम्बन्धी भाषणों का संकलन है। समय-समय पर दिये गए इन भाषणों का अपना अलग महत्त्व है लेकिन इस पुस्तक में एक साथ उनकी प्रस्तुति से जानने में मदद मिलती है कि एक राष्ट्रनिर्माता के रूप में राजेन्द्र बाबू, देश की शिक्षा-व्यवस्था को किस रूप में देखने के आकांक्षी थे और शिक्षा मात्र के बारे में उनके विचार और अनुभव क्या थे। मसलन, भारत को अपने लिए कैसी शिक्षा-व्यवस्था बनानी चाहिए, शिक्षा का माध्यम क्या होना चाहिए, नारी शिक्षा कैसी होनी चाहिए और वह क्यों आवश्यक है, शिक्षा में विज्ञान का क्या महत्त्व है आदि-आदि। यही नहीं, वे विद्यार्थियों के अधिकारों और कर्तव्यों का तथा विद्यार्थी और राजनीति के पारस्परिक रिश्ते का जिक्र भी करते हैं। कहना न होगा कि देश के प्रथम राष्ट्रपति की लेखनी से निकले ये शब्द किसी भी सुधी पाठक को प्रेरित करने वाले है।