Sifar Se Shikhar Tak
(0)
Author:
A. P. MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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अपने चेहरे पर अवध के देहातों की मासूमियत और होंठों पर हर वक़्त एक मेहमाननवाज मुस्कुराहट लिये, आँखों में हमेशा इन्तज़ार के चिराग़ जलाए, दोस्तों के क़दमों पर कान लगाए और कविता तथा शायरी को सीने से लगाए हुए शख़्स का नाम है ए.पी. मिश्र।</p> <p>'सिफ़र से शिखर तक’ एक ऐसे शख़्स की कहानी है जो अपनी तहज़ीबी विरासत, संस्कारों और जद्दोजहद के बल पर अब एक शख़्सियत बन चुका है।</p> <p>गाँव की धूप-छाँव ने उनके चेहरे की शरीफ़ाना मासूमियत को बरकरार रखा है। ब्यूटीपार्लर कितनी ही तरक़्क़ी क्यों न कर जाए, लेकिन गाँव का अल्हड़पन और सादा-मिज़ाजी उसका मुक़द्दर नहीं बन सकती।</p> <p>महात्मा-मिज़ाज शायर अंगद जी महाराज की क़ुरबत और सोहबत ने उन्हें उस मासूम बच्चे जैसा बना दिया, जो कभी कुंभ के मेले में खो जाता है और कभी महाकुंभ में मिल जाता है। लेकिन उस बच्चे के हाथ में खिलौने नहीं होते, उसके हाथों में होती है मीर, कबीर, तुलसी और ग़ालिब की अमानत।</p> <p>अपनी बेपनाह मसरूफ़ियतों के बावजूद ताज़ादम रहना, पराए ग़मों की चादर ओढ़े हुए मुस्कुराते रहना दुश्वार है, लेकिन ‘सिफ़र से शिखर तक’ के शिल्पकार का यही तो हुनर है कि वह जंगली फूलों से शहर को आबाद करना जानता है। अँधेरे से जंग करते हुए उसे कई दहाइयाँ गुज़र गई हैं, लेकिन आज तक न तो उसके हाथों में कँपकँपाहट है और न चेहरे पर थकान। यूँ तो कुछ लोग किताबें लिखते हैं और कुछ ख़ुद किताब होते हैं। उनके जीवन का हर दिन एक वरक़ होता है और हर बरस एक दास्तान।</p> <p>ऐसे ही लोगों को दुनिया सूफ़ी, सन्त और कलन्दर मान लेती है। ऐसे लोग दूसरों पर अहसान करके भी आँखें नीची रखते हैं। 'सिफ़र से शिखर तक’ एक सन्त-मिज़ाज की जीवनी है, लेकिन इस जीवनी के ढेर सारे पन्नों में ऐसे बहुत से चेहरे शामिल हैं, जो ए.पी. मिश्र को संजीवनी मान लेते हैं। काश, इसी क़तार में कहीं हम भी खड़े दिखाई दे जाएँ—</p> <p>तेरे अहसान की ईंटें लगी हैं इस इमारत में,</p> <p>हमारा घर तेरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा।</p> <p>—मुनव्वर राना
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अपने चेहरे पर अवध के देहातों की मासूमियत और होंठों पर हर वक़्त एक मेहमाननवाज मुस्कुराहट लिये, आँखों में हमेशा इन्तज़ार के चिराग़ जलाए, दोस्तों के क़दमों पर कान लगाए और कविता तथा शायरी को सीने से लगाए हुए शख़्स का नाम है ए.पी. मिश्र।</p>
<p>'सिफ़र से शिखर तक’ एक ऐसे शख़्स की कहानी है जो अपनी तहज़ीबी विरासत, संस्कारों और जद्दोजहद के बल पर अब एक शख़्सियत बन चुका है।</p>
<p>गाँव की धूप-छाँव ने उनके चेहरे की शरीफ़ाना मासूमियत को बरकरार रखा है। ब्यूटीपार्लर कितनी ही तरक़्क़ी क्यों न कर जाए, लेकिन गाँव का अल्हड़पन और सादा-मिज़ाजी उसका मुक़द्दर नहीं बन सकती।</p>
<p>महात्मा-मिज़ाज शायर अंगद जी महाराज की क़ुरबत और सोहबत ने उन्हें उस मासूम बच्चे जैसा बना दिया, जो कभी कुंभ के मेले में खो जाता है और कभी महाकुंभ में मिल जाता है। लेकिन उस बच्चे के हाथ में खिलौने नहीं होते, उसके हाथों में होती है मीर, कबीर, तुलसी और ग़ालिब की अमानत।</p>
<p>अपनी बेपनाह मसरूफ़ियतों के बावजूद ताज़ादम रहना, पराए ग़मों की चादर ओढ़े हुए मुस्कुराते रहना दुश्वार है, लेकिन ‘सिफ़र से शिखर तक’ के शिल्पकार का यही तो हुनर है कि वह जंगली फूलों से शहर को आबाद करना जानता है। अँधेरे से जंग करते हुए उसे कई दहाइयाँ गुज़र गई हैं, लेकिन आज तक न तो उसके हाथों में कँपकँपाहट है और न चेहरे पर थकान। यूँ तो कुछ लोग किताबें लिखते हैं और कुछ ख़ुद किताब होते हैं। उनके जीवन का हर दिन एक वरक़ होता है और हर बरस एक दास्तान।</p>
<p>ऐसे ही लोगों को दुनिया सूफ़ी, सन्त और कलन्दर मान लेती है। ऐसे लोग दूसरों पर अहसान करके भी आँखें नीची रखते हैं। 'सिफ़र से शिखर तक’ एक सन्त-मिज़ाज की जीवनी है, लेकिन इस जीवनी के ढेर सारे पन्नों में ऐसे बहुत से चेहरे शामिल हैं, जो ए.पी. मिश्र को संजीवनी मान लेते हैं। काश, इसी क़तार में कहीं हम भी खड़े दिखाई दे जाएँ—</p>
<p>तेरे अहसान की ईंटें लगी हैं इस इमारत में,</p>
<p>हमारा घर तेरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा।</p>
<p>—मुनव्वर राना
Book Details
-
ISBN9788180319297
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।
कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।
इस पुस्तक में ‘वंकिम तोमार नाम’, ‘एक श्रद्धांजलि’, ‘केशव कहि न जाय’, ‘पेयेछी छूटी’, ‘दिशा प्रवर्त्तक’, ‘यात्री आमी ओरे’, ‘एक टी शिशिर बिन्दु!’, ‘लोक्खी टी’, ‘अब न आँखि तर’, ‘कहाँ गईलै हो…’, ‘मरण सागर पारे’, ‘डॉक्टर खजानचन्द्र’, ‘गंगा बाबू कौन’, ‘मेरा भाई’, ‘तुभ्यं श्री गुरुवे नम:’ शीर्षक संस्मरण और रेखाचित्रों को संकलित किया गया है। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
Delhi Ke Chatkhare
- Author Name:
Shahid Ahmed Dehalvi
- Book Type:

- Description: "दिल्ली के चटख़ारे" शाहिद अहमद देहलवी की उन मज़ामीन का मज्मूआ है जिनमें गुज़रे ज़माने के दिल्ली शहर को बड़े ही दिलचस्प तरीक़े से बयान किया गया है। इन मज़ामीन में दिल्ली के बाज़ार, कटरे, मुहल्ले की खिड़कियाँ, फेरी वालों की सदाएँ, देग़ों और भट्टियों से उठने वाली महक का ऐसा बयान है कि पढ़ते हुए सारा मंज़र आँखों के सामने आ जाता है।
Subhedari
- Author Name:
Avinash Subhedar
- Book Type:

- Description: अविनाश सुभेदार यांचं ‘सुभेदारी' हे आत्मकथन म्हणजे लोकसेवेचं असिधारा व्रत स्वीकारून संपूर्ण सेवाकाल त्याच निष्ठेने व्यतीत करणाऱ्या एका ध्येयवेड्या ज्येष्ठ आयएएस अधिकाऱ्याचा, प्रसंगी अविश्वसनीय वाटू शकणारा जीवनप्रवास आहे. या मनमोकळ्या निवेदनाचा विशेष म्हणजे, त्याचा केंद्रबिंदू सर्वसामान्य माणूस हा आहे. साधारणपणे निवृत्त अधिकारी आपल्या आठवणी शब्दबद्ध करतात, तेव्हा प्रकाशझोत स्वत:वर ठेवतात. मात्र, सुभेदारांनी कटाक्षाने हा मोह टाळला आहे. ‘सुभेदारी'मधून लेखकाने लोकहितास केंद्रस्थानी ठेवल्याचे पानोपानी जाणवते. दुसरे वैशिष्ट्य म्हणजे, एखादा अपवाद सोडता कोठेही नकारात्मकता या लिखाणात जाणवत नाही. तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी यांचे खासगी सचिव म्हणून काम करताना या विलक्षण नेत्याचा सहवास त्यांना सलग चार वर्षांपेक्षा अधिक काळ लाभला. त्याबाबतच्या आठवणी अत्यंत वाचनीय आहेत. त्यात आजपर्यंत काळाच्या उदरात लपलेल्या अनेक प्रसंगांचा हृद्य परामर्श वाचकांच्या मनातील राजकारण्यांविषयीची प्रतिकूल प्रतिमा काही अंशी बदलू शकेल एवढा प्रभावी आहे. शासकीय सेवा पार पाडताना नोकरशाहीतील अनेक आव्हाने झेलावी लागतात, कौटुंबिक जीवनाचा प्राधान्यक्रमही कित्येक प्रसंगी दूर ठेवावा लागतो. ही बाजूही सुभेदार यांनी संयत शब्दांत मांडली आहे. व्यक्तिगत स्तरावर विविध मान्यवरांबरोबर सुभेदार यांचे अत्यंत जिव्हाळ्याचे ऋणानुबंध आहेत. तथापि, त्यांनी कधीही अशा नात्यागोत्याचा प्रभाव आपल्या कारकिर्दीवर पडू दिला नाही. ही उपलब्धी आजच्या काळात दुर्मिळ म्हणावी लागेल. ग्रामीण भागातून आलेला एक जिद्दी तरुण परिश्रम आणि सचोटी यांच्या जोरावर सार्वजनिक जीवनात उच्च पदावर कसा पोहोचू शकतो, समाजोपयोगी भरीव योगदान कसे देऊ शकतो, याचा वस्तुपाठ म्हणजे ‘सुभेदारी' हे प्रांजळ आत्मकथन म्हणता येईल. - दिलीप चावरे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया'चे निवृत्त पत्रकार Subhedari | Avinash Subhedar सुभेदारी - अविनाश सुभेदार
Nit Naval Rajkamal
- Author Name:
Subhash Chandra Yadav
- Book Type:

- Description: Biography
Wo Tere Pyar Ka Gam
- Author Name:
Ishmadhu Talwar
- Book Type:

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Description:
दान सिंह का निधन मैलोडी के लिए बड़ा नुक़सान है। मैं उन्हें मूल्यों और गरिमा में गहरा विश्वास रखनेवाले इनसान के रूप में याद करता हूँ।
—गुलज़ार; मशहूर गीतकार
दान सिंह जी की धुनों से सजा गीत—‘वो तेरे प्यार का गम’—मेरे पिताजी (मुकेश) के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक था।
—नितिन मुकेश; प्रसिद्ध गायक
वरिष्ठ संगीतकार दान सिंह जी ने ‘माइ लव' के रूप में फ़िल्मी संगीत को ऐसा तोहफ़ा दिया है जिसकी चमक कोहिनूर हीरे जैसी है। जब भी अच्छे और पायेदार फ़िल्मी संगीत की बात होगी तो ‘माइ लव’ के संगीत को शायद नहीं भूला जाएगा। दान सिंह जी उन ख़ुशनसीबों में से थे जो बहुत कम समय फ़िल्म जगत में रहकर और बहुत कम काम करके अमर हो गए।
—इरशाद कामिल; मशहूर फ़िल्म गीतकार
जयपुर के पत्रकार ईशमधु तलवार ने किसी ज़माने में ख्याति पाए संगीतकार दान सिंह, जिनके मृत होने की अफ़वाह थी, को जीवित खोज निकाला और तनहा गुमशुदा-सी ज़िन्दगी के अँधेरों से वे बाहर आए।
—जयप्रकाश चौकसे; प्रसिद्ध फ़िल्म समीक्षक
दान सिंह जी के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वो अपने समय के सभी दिग्गजों के बीच अपनी अलग धारा चले, पक्की और मधुर धुनों के साथ-साथ दान सिंह ने कविता की ऊँचाई को भी क़ायम रखा।
—यूनुस ख़ान; मशहूर रेडियो एनाउंसर, विविध भारती, मुम्बई
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