Nirman-Purush Dr. Ambedkar Ki Samvidhan-Yatra
(0)
Author:
Anoop BaranwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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आज़ादी के समय देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भावी शासन-व्यवस्था में सामन्तवाद को प्रभावी होने से बचाना था। समाज में व्याप्त सामन्तवाद के ख़िलाफ़ लड़ते रहनेवाले बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा संविधान-निर्माण के दौरान इस चुनौती से किस तरह निपटा गया? इसका जवाब खोजने के साथ संविधान में ‘देश के नाम’, ‘राज्यक्षेत्र’, ‘मूल अधिकार’, ‘नीति-निर्देशक सिद्धान्त’ से सम्बन्धित अनुच्छेद 1 से 51 तक के प्रावधानों को अन्तिम रूप देने के लिए संविधान सभा में हुई बहस को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।</p> <p>बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की जीवनी में रूचि रखनेवाले देशवासियों के समक्ष आज़ादी के आन्दोलन में डॉ. अम्बेडकर की भूमिका को सन्देह के घेरे में रख तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं, इस पुस्तक में इसका भी जवाब खोजने का प्रयास किया गया है।</p> <p>देश की ग़ुलामी के लिए उत्तरदायी रही भारतीय समाज की सामन्तवादी प्रवृत्ति को समाप्त करने एवं देश को आन्तरिक ग़ुलामी से मुक्त कराने में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा किए गए संघर्ष और उनके विचार का विश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।</p> <p>बिलकुल विपरीत परिस्थिति में भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश के लिए सर्वमान्य संविधान के निर्माण में डॉ. अम्बेडकर एवं अन्य संविधान निर्माताओं की भूमिका का भी विश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
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आज़ादी के समय देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भावी शासन-व्यवस्था में सामन्तवाद को प्रभावी होने से बचाना था। समाज में व्याप्त सामन्तवाद के ख़िलाफ़ लड़ते रहनेवाले बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा संविधान-निर्माण के दौरान इस चुनौती से किस तरह निपटा गया? इसका जवाब खोजने के साथ संविधान में ‘देश के नाम’, ‘राज्यक्षेत्र’, ‘मूल अधिकार’, ‘नीति-निर्देशक सिद्धान्त’ से सम्बन्धित अनुच्छेद 1 से 51 तक के प्रावधानों को अन्तिम रूप देने के लिए संविधान सभा में हुई बहस को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।</p>
<p>बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की जीवनी में रूचि रखनेवाले देशवासियों के समक्ष आज़ादी के आन्दोलन में डॉ. अम्बेडकर की भूमिका को सन्देह के घेरे में रख तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं, इस पुस्तक में इसका भी जवाब खोजने का प्रयास किया गया है।</p>
<p>देश की ग़ुलामी के लिए उत्तरदायी रही भारतीय समाज की सामन्तवादी प्रवृत्ति को समाप्त करने एवं देश को आन्तरिक ग़ुलामी से मुक्त कराने में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा किए गए संघर्ष और उनके विचार का विश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।</p>
<p>बिलकुल विपरीत परिस्थिति में भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश के लिए सर्वमान्य संविधान के निर्माण में डॉ. अम्बेडकर एवं अन्य संविधान निर्माताओं की भूमिका का भी विश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
Book Details
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ISBN9789352211968
-
Pages329
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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चे को किसी ‘महामानव’ या ‘मसीहा’ के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। चे अपनी कमियों, अच्छाइयों, शक्तियों, कमज़ोरियों के साथ पूरी सम्पूर्णता में उस समाज के मनुष्य का, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का न तो अस्तित्व हो और न ही सम्भावना, प्रतिनिधित्व करते हैं। इस महागाथा के सात सोपान हैं ‘बचपन के दिन’ में अर्जेन्टीना के उस ज़माने के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में एक ह्रासमान बुर्जुआ अभिजात परिवार में जन्म लेने से लेकर किशोरावस्था को पार करते हुए जवानी की दहलीज़ तक पहुँचने की दास्तान है। ‘उत्तर की खोज में दक्षिण की राह’ अपने से काफ़ी बड़ी उम्र के मित्र के साथ खटारा मोटरसाइकिल पर दुनिया-जहान को देखने-समझने निकल पड़ी जवानी की दहलीज़ चढ़ते एक किशोर की कहानी है। ‘एक बार फिर सडक़ पर’ मार्क्सवादी साहित्य के अध्येता नौजवान की डॉक्टरी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद अपनी ख़ुद की तलाश में एक बार फिर निकल पड़ने की कहानी है। ‘क्यूबा क्रान्ति की दास्तान’ गुरिल्ला दस्ते के डॉक्टर से गुरिल्ला लड़ाका, गुरिल्ला सेना कमांडेंट, क्यूबा क्रान्ति के विजयी कमांडर और समाजवादी क्यूबाई समाज के नवनिर्माण की मुहिम के सबसे दक्ष नायक बनने की कहानी है। ‘क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयता के कार्यभार’ एक बार फिर चे को सब कुछ छोडक़र अन्तरराष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में लहू और बारूद की राह पकड़ने को मजबूर करते हैं। ‘शहादत की राह पर’ चे के बोलिवियाई अभियान के अद्भुत-अकल्पनीय शौर्य की दास्तान है। ‘उत्तरगाथा’ गिरफ़्तारी के बाद अमेरिकी-बोलिवियाई जल्लाद मंडली के हाथों चे की हत्या और उनके दुनिया के मुक्ति-संघर्ष के प्रतीक बन जाने की कहानी है।
चे के अनन्यतम साथी फिदेल ने बिलकुल सही कहा कि चे के बारे में जो कुछ कहा गया, लिखा गया और जो कुछ कहा जाएगा, लिखा जाएगा या जो कहा जा सकता है और लिखा जा सकता है, चे उससे कहीं बढ़कर है।
Kahani Smriti Irani Ki (Hindi Translation of The Smriti Irani Story)
- Author Name:
Kartikeya Tanna
- Book Type:

- Description: कौन कहता है, आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता! भारतीय राजनेता, कैबिनेट मंत्री, पूर्व टेलीविजन अभिनेत्री और अब एक लेखिका भी—स्मृति इरानी—ने 23 मई, 2019 को हिंदी की इस लोकप्रिय पंक्ति को ट्वीट किया था। उन्होंने दशकों से गांधी परिवार का गढ़ रहे उत्तर प्रदेश के अमेठी निर्वाचन क्षेत्र में एक चुनावी लड़ाई में नेहरू-गांधी परिवार के वंशज राहुल गांधी को हराया था। इरानी ने 2014 में भी अमेठी से चुनाव लड़ा था, लेकिन तब असफल रही थीं। फिर भी अगले पाँच वर्षों तक वे अमेठी आती रहीं। उन्हें ऐसा करने के लिए किस बात ने प्रेरित किया? 2004 में उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पद से इस्तीफा नहीं देने तक अनशन करने की धमकी दी थी; और 2014 में अमेठी में एक रैली में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी ने उन्हें अपनी छोटी बहन कहकर संबोधित किया था। यह परिवर्तन कब और कैसे हुआ? एक टेलीविजन अभिनेत्री के रूप में अपनी सफलता के चरम पर होने के बावजूद उन्होंने राजनीति में कदम क्यों रखा? उन्होंने भाजपा को क्यों चुना? उन्होंने मीडिया और मनोरंजन के क्षेत्र में कॅरियर बनाने की कोशिश क्यों की? उनके बचपन ने उनके दृष्टिकोण और मन की भावनाओं को किस प्रकार आकार दिया? उनकी कमजोरियाँ क्या हैं? क्या है, जो उनके भीतर के रक्षातंत्र को सक्रिय करता है और वे उनसे कैसे निकलती हैं? अमेठी की ऐतिहासिक जीत का उपयोग एक संदर्भ रूप में करते हुए यह पुस्तक मुख्य रूप से एक ऐसी महिला की कहानी को जानने का प्रयास है, जिसने अपने स्त्रीत्व का सहारा नहीं लिया बल्कि अपने शक्तित्व को, अपनी दिव्य स्त्रीऊर्जा को शक्ति के एक अदम्य स्रोत के रूप में व्यक्त किया।
Rajniti Meri Preyasi
- Author Name:
Arun Bhole
- Book Type:

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Description:
लेखक के इस मंतव्य से असहमत होना कठिन है कि दल और सत्ता की राजनीति में फँसे लोग दूरदर्शी नहीं हो सकते। लोकतांत्रिक कुरीतियों के बल पर घटिया लोगों ने बढ़िया लोगों को राजनीति से किनारे कर दिया है और खुद सब जगह छा गए हैं।
—विष्णु प्रभाकर
समाजवादी आदर्शों और सपनों की छाँह में पले और बड़े हुए श्री भोले, जयप्रकाश, लोहिया आदि के साथ रहे और उन्हें काफी नजदीक से देखा। उनकी निराशा में वो तमाम लोग उनके साथ रहे होंगे जिन्होंने समाजवादी आन्दोलन और उसके नेताओं से बड़ी आस लगा रखी थी।
—दिनमान
राजनीति, जिसे आवश्यक रूप से समाज की प्रगति का निमित्त होना चाहिए था, कैसे अपने साथ पूरे समाज को बहा कर गड्ढे की तरफ ले जाने लगी। राजनीति को अरुण भोले ने अपनी प्रेयसी कहा है और उसके प्रति उनका आवेग सर्वत्र स्पष्ट है, पर इस आवेग के बावजूद अरुण भोले अपनी नजर साफ रखते हैं। यह जैसे एक तटस्थ दर्शक की डायरी है। यही बात इसे इतना महत्त्वपूर्ण बनाती है जिससे यह पुस्तक पठनीय ही नही विचारोत्तेजक भी है।
—जनसत्ता
इस पुस्तक में एक रोचक उपन्यास के सभी तत्त्व वर्तमान हैं और एक बार हाथ में उठा लें तो बिना समाप्त किए इसे छोड़ने का जी नहीं चाहता।
—नई धारा
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