Mohan Gata Jayega
(0)
Author:
Vidya Sagar NautiyalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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‘लेकिन इन पहाड़ों में मानव जीवन विकट है।...मैं इस विकट पहाड़ में रच-बस गया। इसे छोड़कर कहीं भाग जाने की बात नहीं सोची। अपनी रचनाओं में मैं इस पहाड़ की सीमाओं के अन्दर घिरा रहा। टिहरी से बाहर नहीं निकला। निकलूँगा भी नहीं।’ (इसी पुस्तक में लेखक के वक्तव्य का अंश)।</p> <p>‘मोहन गाता जाएगा’ में कथा-शिल्पी विद्यासागर नौटियाल ने पहाड़ के जीवन, टिहरी की ज़िन्दगी के दर्द, उससे लगाव, अपने छात्र-जीवन, जन-आन्दोलन, राजनीतिक सक्रियता, मानवीय सम्बन्धों और मित्रता की ऊष्मा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा, व्यापक अनुभव, सजग दृष्टि के साथ टुकड़े-दर-टुकड़े, हरफ़-ब-हरफ़ अद्भुत सांगीतिक गद्य में कहने का सहज प्रयास किया है। उन्नीस सौ छप्पन से दो हज़ार तक चार दशक से ऊपर के समय में टिहरी, काशी, लखनऊ, देहरादून में लिखी और उपलब्ध ये रचनाएँ महज़ ‘यत्र-तत्र’ टिप्पणियाँ, वक्तव्य, वृत्तान्त या आत्मपरक रचना-अंश नहीं हैं बल्कि अपने समय के सामाजिक जीवन का अलग-अलग प्रसंगों में निजी स्पर्श भी हैं।</p> <p>‘मो०हन गाता जाएगा’ दरअसल विद्यासागर नौटियाल का ‘आदमीनामा’ है, जिसमें वे रचनाकार की संवेदना और उसकी चेतना, उसकी ज़िन्दगी में आए लोगों, पढ़ी-लिखी गई रचनाओं, राजनीतिक गतिविधियों, यात्राओं, डायरी और सम्बोधनों आदि के माध्यम से अपने विलक्षण मित-कथनों में अपनी स्मृतियों, विचारों और आकांक्षाओं को बेहद जीवन्त, आत्मीय, रोचक और प्रामाणिक ढंग से अतिरिक्त प्रासंगिकता देते हैं।</p> <p>—मुहम्मद हम्माद फ़ारूक़ी
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‘लेकिन इन पहाड़ों में मानव जीवन विकट है।...मैं इस विकट पहाड़ में रच-बस गया। इसे छोड़कर कहीं भाग जाने की बात नहीं सोची। अपनी रचनाओं में मैं इस पहाड़ की सीमाओं के अन्दर घिरा रहा। टिहरी से बाहर नहीं निकला। निकलूँगा भी नहीं।’ (इसी पुस्तक में लेखक के वक्तव्य का अंश)।</p>
<p>‘मोहन गाता जाएगा’ में कथा-शिल्पी विद्यासागर नौटियाल ने पहाड़ के जीवन, टिहरी की ज़िन्दगी के दर्द, उससे लगाव, अपने छात्र-जीवन, जन-आन्दोलन, राजनीतिक सक्रियता, मानवीय सम्बन्धों और मित्रता की ऊष्मा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा, व्यापक अनुभव, सजग दृष्टि के साथ टुकड़े-दर-टुकड़े, हरफ़-ब-हरफ़ अद्भुत सांगीतिक गद्य में कहने का सहज प्रयास किया है। उन्नीस सौ छप्पन से दो हज़ार तक चार दशक से ऊपर के समय में टिहरी, काशी, लखनऊ, देहरादून में लिखी और उपलब्ध ये रचनाएँ महज़ ‘यत्र-तत्र’ टिप्पणियाँ, वक्तव्य, वृत्तान्त या आत्मपरक रचना-अंश नहीं हैं बल्कि अपने समय के सामाजिक जीवन का अलग-अलग प्रसंगों में निजी स्पर्श भी हैं।</p>
<p>‘मो०हन गाता जाएगा’ दरअसल विद्यासागर नौटियाल का ‘आदमीनामा’ है, जिसमें वे रचनाकार की संवेदना और उसकी चेतना, उसकी ज़िन्दगी में आए लोगों, पढ़ी-लिखी गई रचनाओं, राजनीतिक गतिविधियों, यात्राओं, डायरी और सम्बोधनों आदि के माध्यम से अपने विलक्षण मित-कथनों में अपनी स्मृतियों, विचारों और आकांक्षाओं को बेहद जीवन्त, आत्मीय, रोचक और प्रामाणिक ढंग से अतिरिक्त प्रासंगिकता देते हैं।</p>
<p>—मुहम्मद हम्माद फ़ारूक़ी
Book Details
-
ISBN9788171198771
-
Pages276
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया महान् भारतीय इंजीनियर, विद्वान्, शिक्षाविद्, राजनेता और मैसूर के दीवान रहे। विश्वेश्वरैया को दीर्घायु का स्वस्थ जीवन मिला। 15 सितंबर, 1860 को जनमे विश्वेश्वरैया को सन् 1955 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मिला। उन्होंने ब्रिटिश राज के मातहत भी अनेक उच्च राजपदों पर कार्य किया और सदैव जनहित को सर्वोच्च रखा। मैसूर के कृष्ण राज सागर बाँध का निर्माण उन्हीं की देखरेख में हुआ और हैदराबाद के बाढ़ सुरक्षा तंत्र के प्रमुख डिजाइनर वे ही रहे। इसके अलावा उन्होंने अनेक प्रमुख भवन, बाँध व सड़क निर्माण परियोजनाओं का कार्यान्वयन किया। उनके उत्कृष्ट आभियांत्रिक कार्यों के लिए उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ दि इंडियन एंपायर’, ‘भारत रत्न’ जैसे दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित देशी-विदेशी पुरस्कारों और मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। उनकी जन्मतिथि 15 सितंबर को सम्मानस्वरूप ‘अभियंता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। छात्रों, युवाओं तथा सभी आयुवर्गों के पाठकों के लिए पठनीय एक महान् विभूति की उत्कृष्ट जीवनी। "
Abra Kya Chiz Hai? Hawa Kya Hai?
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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Description:
कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों की जो पुस्तकें इससे पहले प्रकाशित हुई हैं, उन्हें अपनी बेबाकी, लेखक के निर्मम आत्मालोचन, व्यक्तियों और घटनाओं पर तात्कालिक प्रतिक्रियाओं, अनेक देशी-विदेशी लेखकों और कृतियों के आस्वादन और प्रासंगिक आकलन के लिए याद किया जाता है। उनका अनौपचारिक गद्य, फिर भी, एक बड़े लेखक का गद्य है और ये डायरियाँ अपने समय-समाज-साहित्य आदि को देखने, गुनने का एक लेखकीय उपक्रम। उसके वितान में मित्र, लेखक, कलाकार आदि सब आते हैं और उसमें आपबीती रोचक ढंग से परबीती बनती जान पड़ती है।
—अशोक वाजपेयी
Kahi Na Jay Ka Kahie
- Author Name:
Bhagwaticharan Verma
- Book Type:

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Description:
“मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा। यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए महत्त्व का नहीं है। लेकिन अपना नाम सैकड़ों-हज़ारों वर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस लापरवाही वाली अकड़ के बावजूद, मन के किसी कोने में जब-तब उचक-उचक पड़ती है।
“तो मैं भगवतीचरण वर्मा, पुत्र श्री देवीचरण, जाति कायस्थ, रहनेवाला फ़िलहाल लखनऊ का, अपनी आत्मकथा कह रहा हूँ। कुछ हिचकिचाहट होती है, कुछ हँसी आती है—बेर-बेर एक पंक्ति गुनगुना लेता हूँ—‘कहि न जाय का कहिए।’ तो यह आत्मकथा मैं दूसरों पर अपने को आरोपित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह दूसरों का मनोरंजन करने के लिए कह रहा हूँ।”
लेकिन दुर्भाग्य से यह आत्मकथा पूरी न हो सकी। अगर पूरी हो गई होती तो निश्चय ही यह हिन्दी में एक महत्त्वपूर्ण आत्मकथा होती। ‘चित्रलेखा’, ‘भूले-बिसरे चित्र’, ‘रेखा’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’ जैसे उपन्यासों के रचनाकार भगवती बाबू ही यह कह सकते थे कि अपनी आत्मकथा वे दूसरों के मनोरंजन के लिए कह रहे हैं।
इस अधूरी आत्मकथा को किसी हद तक पूरा करने के लिए उनका तीन किश्तों में लिखा एक आत्मकथ्य ‘ददुआ हम पै बिपदा तीन’ भी इस पुस्तक में दिया जा रहा है। इसमें पाठकों को अपने प्रिय लेखक को समझने के लिए और व्यापक आधार मिलेगा।
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